Tuesday, 12 July 2022

पुरानी कहानी

📔पुरानी कहानी📔

बात उतनी भी पुरानी नहीं! कहानी उस दौर की है जब हर हर घर के आंगन में आम , जामुन, अमरूद, कटहल , नारियल और भी कई तरह के फलदार पेड़ लगे हुआ करते थे जिनके पके और अधपके फलों से भरी डालियां बरामदे से बाहर भी झूमा करते थे ।🌳 हमारे झुंड बिना व्हाट्स के हुआ करते और हर कोई एडमिन हुआ करता!👨‍🚒

हम अक्सर जामुन, आम आदि फल चुराकर और खुद से तोड़कर खाया करते थे । कभी आंगन की तंग दीवारों पर चुपके से चढ़कर तो कभी झुकी डालियों में करीने से लटकते हुए पेड़ के ऊपर । आंगन के बाड़े के छेदों में पैर फंसाए हम लटकते फलों तक पहुंचने का नायाब हुनर रखा करते । फल चाहे पका हो या अधपका और या फिर कच्चा, हम इंतजार में यकीं नहीं करते थे! बस तोड़ लेने का जानदार जज़्बा हुआ करता! नाजुक बदन पर चाहे कितने ही खरोचें आ जाए मगर निशाना चूके नहीं चूका करता ।🤺 हमारी गुटों की रणनीति बेजोड़ हुआ करती । एक साथी तो बस उस खड़ूस बुढ़िया के आने पर ही टूक नज़र रखा करता जिसके आंगन में पके शरीफों से लदे पेड़ हुआ करते ।🍑 बेर के कांटों से भरे डाल हमारे जज़्बातों के आगे कुछ भी नहीं हुआ करते ।🍒 अधपके बेर से हमारे पॉकेट भरे रहा करते । काले नमक और पिसे हुए लाल मिर्च की पुड़िया हमेशा हमारे पॉकेट में हुआ करती और हम बेर और इमली के साथ उन्हें मिलाकर पुराने खंडहर में बड़े शान से राजशाही अंदाज में खाया करते ।🥑 परोस की काकी के घर के कच्चे अमरूद जो कभी पूरे पक न सके इसका श्राप हमें रोज लच्छेदार भाषा में मिला करता और हम बस आंखें बंद किए कसीले अमरूदों में भी पुख्ता स्वाद ढूंढ लिया करते । फल तो फल , हम तो फूलों तक को ब्रह्मबेला से पहले ही तोड़कर उनकी जन्मजात खुशबुओं से रूबरू हो जाया करते।🌺 पूजा के फूल तड़के सवेरे हम चुरा कर पहले ही पूजा कर लिया करते।🪷 बिना उगाए और सींचे ही हम पूरी बगिया के सुल्तान हुआ करते । जहां तक हमारी पहुंच नहीं होती , हमारी गुलेल पहुंच जाती । निशाना अचूक हुआ करता । उन दिनों ओलंपिक ज्यादा मशहूर नहीं था और गुलेल को शामिल भी नहीं किया गया था नहीं तो गोल्ड 🏅 पक्का था । गुलेल भी हम चुराई हुई अमरूद की टहनी और चमरे और रिक्शे के सीट के रबर से ही बनाया करते । पूरा फ़्री का शो हुआ करता वो भी हर वक्त । बंसी लेकर घंटों तालाब के किनारे बैठकर बेर खाते हुए मछली पकड़ना और फिर सेठजी के आते ही दौड़ते गिरते भाग खड़ा होना और फिर मुर्गियों के ताजे नरम अंडे उठाकर छिपा देना । ये सब हमारे कंपल्सरी आउटडोर एक्टिविटी हुआ करते । इंडोर का स्कोप चूंकि था ही नहीं तो हम आउटडोर में ही व्यस्त होकर रहा करते । मार - पीट , कुटाई , डांट - डपट , पेड़ पर उल्टा लटका देने जैसे दंड हमारे लिए बहुत छोटी और तुच्छ सी चीज़ हुआ करती जिसकी अच्छी खासी प्रैक्टिस हमने कर रखी थी । हमारे लिए हमारे मिशन का टारगेट ज्यादा अहम था न कि कुटाई । "मिशन एकंप्लिशड" ही हमारा एकमात्र ध्येय हुआ करता और मरते दम तक उसे पूरा करते फिर चाहे कितनी ही रातें क्यों न काली करनी होती । वो जुनून, वो जोशो - खरोस , वो जज़्बा हमारे अंदर लबालब भरा हुआ करता । ये पुरानी कहानी थी हमारी उस जिंदगानी की! 


युग बदला और फिर झुंड बदला  फिर हमें ख्याल आया कि हमें तो विकसित होना है ! पश्चिम की भांति सजावटी दिखावटी बनना है। बस फिर क्या था फलदार पेड़ों को जगह ले ली सजावटी पेड़ पौधों ने और डंडे, पत्थर से फल तोड़ने और पेड़ पर मित्र की मदद से चढ़ने की कला का स्थान ले लिया, मोबाइल ने और सेल्फी स्टिक ने । बचपन जिसको मिट्टी में लोटना था, कीचड़ में खिलना था और नदियों में तैरना था  वो रील, टिकटोक, फेसबुक, इंस्टाग्राम, पब जी, 4 जी में घुस गया।
बस होना क्या था..सब कहानी खत्म, हो गया, टाटा, बाय बाय! 🫠

अब नेटफ्लिक्स और अमेजन पर वेब सीरीज देख बच्चे कौतुहलता को महसूस किया करते हैं और असली रोमांच जो पुरानी जिंदगी में थी उसको बस परदे पर देख उसकी चुभन महसूस करते हैं । जिंदगी बदल गई है अब । आहते पर अब आम और अमरुद नहीं और वो झुंड भी नहीं! खड़ूस बुढ़िया की लच्छेदार गालियों का संगीत अब कहां? सेठजी के तालाब अब सूख चुके हैं और बचपन का वो रस भी अब सूखकर रसातल में चला गया है। वो सौंदर्य और संगीत अब स्टूडियो तक ही सीमित रह गया है । बचपन अब बेजान चीजों में जान ढूंढती नज़र आती है! वो जिंदगी जो हम जी चुके जिसने हमें जिंदगी का हर फलसफा समझाया और जिसने हर चीज से जुड़ने का सबक सिखाया और जिसने संघर्ष का पाठ पढ़ाया अब दिखता नहीं । बगीचे उजाड़ दिए गए और फिर चॉइस बदल दी गई और फिर सबकुछ बदल गया! ☺️ 

(राजू दत्ता ✍🏻)

Friday, 24 June 2022

कजरौटा काजल का

#कजरौटा काजल का#
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बात उन दिनों की है जब हम बिना जॉनसन शैंपू और पाउडर के जॉनसन बेबी से भी ज्यादा स्मार्ट दिखा करते थे! यकीं नहीं होता न? एक बार गौर और इत्मीनान से ठंडे दिमाग के साथ  फ़ोटो को देख डालिए तो सबकुछ साफ़ दिख जायेगा ....!👼🏻

आजकल सुपरफास्ट 5जी का जमाना है । पैदा होने से पहले ही घर पर जॉनसन का पैक तैयार मिलता है और छट्टी में तो 10 में से 8 शगुन तो जॉनसन का ही रहता है । शैंपू, तेल , चिरोनी और लंगोट से लेकर पोछना तक ...सब ब्रांडेड और अंगरेज वाला । 

जॉनसन काल से पहले तो पैदा होते ही घुट्टी पिलाकर कड़वा तेल से जबरदस्त मालिश किया जाता और मालिश के दरम्यान सरसो तेल के दीए के ऊपर कजरौटा लगाकर देशी काजल से आंखों पर सूरमा कुछ ऐसे ही लगाया जाता था । आंखों पर परपराकर लगने वाला जलन अभी भी काजल देखते ही महसूस हो जाता है । एक बार काजल घसने के बाद धीरे - धीरे पूरे का पूरा काजल फैलकर पूरे चेहरे को अपनी आगोश में लेकर एक नायाब और बेहद खूबसूरत चेहरे का रूप हमें दिया करता । गले और बाह में काला धागा और काजल का जलवा हमें अप्रतिम सौंदर्य से ओत प्रोत कर दिया करता । कसम से इतना स्मार्ट तो अंगरेज का आज का बच्चा भी नहीं दिखता जितना कि काजल पोते हम चवन्नी की मुस्कान मारे दिखा करते थे ।😍

पहले तो बच्चा का गंध भी अलग ही होता था । कड़वा तेल, काजल और कपड़े में सूख चुके दूध और बच्चे के चरणामृत का मिश्रित गंध खास तरह का ही होता था ।😍

अब तो बच्चा जॉनसन वाला महक छोड़ता है और काजल का टिक्का तो खोजना ही पड़ेगा कि किधर है । कजरौटा वाला दिन अब ढल गया है और जॉनसन वाला डब्बा मजे में है । लंगोट विकास का चरम रूप लेकर अपने नए अवतार "डायपर" में तब्दील हो चुका है । जींस और टॉप के फैशन में अब भला देशी और आरामदायक लंगोट बनाने के लिए मां की साड़ी का टुकड़ा कहां से मिलेगा । और फिर डायपर मां बाप को पूरा सुविधा भी तो दे डालता है....मस्त सोते सोते मोबाइल देखते हुए लुढ़क जाइए ..... चद्दर - भोटिया और लंगोट बदलने का कोनो झंझट नहीं ...🥳

अब डायपर पहन के बच्चा काजल लगाकर अपना इज्ज़त का फलूदा तो नहीं निकाल सकता न !👻

 मगर बिना काजल पोते बच्चा स्मार्ट कैसे दिख सकता है ये समझ से परे है.... 🤔

खैर! काजल का जलवा हमेशा रहेगा भले ही आदमी कितना भी डायपर बदल ले ...! ये वाला  मुश्की काजल लगाकर ही आएगा और यही दिल लूट ले जायेगा ...!🥰 

(©राजू दत्ता✍🏻)

Tuesday, 18 May 2021

ओवरब्रिज

#ओवरब्रिज

पुराने ओवर ब्रिज से जुड़ी यादों को भला कौन भुला सकता । ऊपर हम और नीचे छुक - छुक चलती रेल को देख लेने का वो बेहतरीन पल हम आजतक नहीं भूल पाए हैं । ठीक ऊपर चढ़कर सायकिल पर बैठ बिना पैडल मारे अपने पैरों को उठाए ठीक बसंत टॉकीज पर हरहरा के पहुंच जाना किसी फॉर्मूला वन के रेस से कोनो कम नहीं था । सायकिल के टायर को ऊपर से नीचे हांकते हुए दौड़ते - दौड़ते हम सीधे बनिया टोला पहुंचकर ही दम साधा करते । लोहे की गोल रिंग को सीक से गोल - गोल चलाते हुए ऊपर से नीचे तूफानी रफ्तार में हम रोज ओलंपिक जीत लेने का सबब रखते थे । बॉल बेयरिंग लगी लकड़ी की गाड़ी को ऊपर ले जाकर उसपर बैठ तूफानी रफ्तार से नीचे आकर अपने हाथ - पैरों से ही ब्रेक लगा हम उन्हीं दिनों फोर व्हीलर का लुफ्त उठा चूके थे । थोड़े बड़े हुए तो रोज शाम को भुट्टा खाने ओवर ब्रिज जा धमकते और चूल्हे की आंच में तपे भुट्टे पर नींबू और नमक का तड़का लिए सबूत हरी मिर्च को हपक - हपक कर खाने का मजा तो हम कटिहार वाले ही ले सकते थे । घंटों ओवर ब्रिज पर यूं ही बेवजह ही वजह ढूंढते फिरा करते हम । कभी चुंबक ढूंढने की कवायद तो कभी नीचे दौड़ती रेल के डब्बे गिनने की होड़ । कभी घंटों रेलवे की वो वाटर टैंक में भरते पानी को देख अपनी दांतों तले उंगिलियों को दबाया करते और बातें किया करते कि पूरी दुनिया में पानी यहीं से जाता है और पानी टंकी अगर टूट गई तो पूरी दुनिया डूब जायेगी । ये सारे अफसाने तो बस ओवर ब्रिज पर ही टिके थे । सूअरों के झुण्डों को नीचे चरते देखना और ऊपर से सरकते हुए उनके पास जाना और फिर भाग खड़ा होना बहुत ही एडवेंचर का काम हुआ करता । यही तो एक चीज हुआ करती थी उन दिनों जहां हम अपने बचपन को अपनी तस्वीर दिया करते और धीरे - धीरे बड़े होते गए । स्टीम इंजन की स्टीम जितने करीब से हमने देख रखा है , शायद ही किसी ने देखा हो । ओवर ब्रिज ने हमारे बचपन और जवानी के सफर के बीच ब्रिज का ही काम नहीं किया बल्कि आज भी उनका वो अद्भुत सौंदर्य हमें अपने उन पुराने दिनों में खींच ले जाता है , जहां हमारी जिंदगी बेवजह ही वजह ढूंढा करती थी।

(राजू दत्ता✍️)

Monday, 5 April 2021

सुकून की चाय

एक छोटा गैस सिलेंडर , दो चार काम चलाऊ बर्तन और एक सॉसपेन । बस किचन के नाम पर यही पर्याप्त था । फर्नीचर के नाम पर एक लकड़ी की टेबल और एक कुर्सी । पलंग या चौकी की जरूरत नहीं थी । जमीन पर बिछे गद्दे पर ही गहरी नींद आ जाया करती । एक रेडियो जिसपर गीतमाला चलती रहती और बीबीसी का समाचार । हमने नए दौर में भी पुराने गानों को विरासत की तरह समेटे रखा था । बस उसी सिमटी सी दुनिया में फैली हुई जिंदगी गुलज़ार हुआ करती । बस कुछ ही रुप्पयों में जिंदगी आलीशान सी गुजरा करती थी । कूकर की सीटी के साथ चिकन कड़ी , अंडे का तड़का और फिर पनीर का देशी स्वाद और फिर उसी कूकर में पका चावल । खाना बनने के दौरान टाटा गोल्ड की कड़क चाय सॉसपैन में उबलती हुई अपनी भीनी - भीनी खुशबू छोड़ती हुई हमें महकाया करती । खाना तैयार होते ही न्यूजपेपर बिछाकर पहले लैपटॉप ऑन कर भूले - बिसरे आईएमडीबी रेटिंग 8 से 10 वाले मूवी का झटपट लगाना और ऊपर से दिनभर की भूखी पेट और पूरी तरह चटे हुए दिमाग को शानदार खुराक के साथ बीता हुआ पल कोई मामूली नहीं था । खाना खत्म हो जाता मगर फिल्म चलती रहती और हम अपनी हाथों के साथ - साथ बर्तन को भी चाट - चाटकर साफ और बिल्कुल साफ कर दिया करते । फिर देर रात और टाटा टी गोल्ड का साथ और फिर कंबल ओढ़ के बातों का दौर और फिर गहरी और बहुत गहरी नींद। बिना ज्यादा खर्चों के करकी की जिंदगी भी कितनी सुकून भरी थी । तनख्वाह काफी कम थी , उतनी कम कि रोज की जिंदगी गुलज़ार हो जाया करती और फिर तनख्वाह बढ़ी और फिर सपने बढे । सपनों की जिंदगी में हकीकत के अफसाने खोते चले गए । बरसों का साथ , दोस्तों का हाथ और वो चाय की सॉसपेन अब भी है मगर वो आलम , वो बिना थके रातों का जागरण नहीं रहा । अब रातें उन यादों को लेकर आती है और हम यूं ही उन जलती चाय की खुशबुओं में खुद को डुबोकर फिर वही शाम जी लिया करते हैं । चीजें कम हो तो जिंदगी में बोझ भी शायद कम होते होते हैं और चीजें बढ़ती जाती हैं और बोझ भी । जिंदगी का असली शुरूर हल्का होना ही है और हल्की सी जिंदगी ही बहुत और बहुत ऊंची उड़ा करती है ।

(राजू दत्ता ✍️)

बर्फवाला

बात उन गर्मियों की है जब हम वो लाल - पीली और हरी - नीली आइस्क्रीम के उतने ही दीवाने हुआ करते जितने कि आज चाय के हुआ करते हैं । हल्की मिठास और थोड़ी सी कड़वाहट लिए पिघलती सी आइस्क्रीम से हमारे दिल पिघला करते और हम आइस्क्रीम वाले की घंटियों और डमरूओ की दिल धड़काने वाली आवाज पर सारे बंधन तोड़ उन तपती दुपहरी में निकल पड़ते । पैसे की परवाह किसे थी , बस निकल ही पड़ते । दूध वाली आइस्क्रीम और ऊपर से नारियल के बुरादे मिलकर हमें एक नायाब स्वाद दिया करते वो भी एक चवन्नी में । आइस्क्रीम में थोड़ा नमक डाल हम उसके भीतर के कीटाणुओं को खुली आंखों से देख लेने का हुनर रखते थे । आइस्क्रीम को चूसते हुए उसके ऊपर सिक्के रखकर उसकी छपाई देखकर हम जो मजे लिया करते वैसा कोई दूसरा मजा आजतक नहीं मिला । कभी - कभार आइस्क्रीम को गमछे के बीच रखकर थकोचकर उसका गोला भी बना लिया करते । आइस्क्रीम खाने के बाद उसकी बची हुई बांस की डनठी को जमा कर हम बांस की दीवारें यानी टट्टी बनाया करते। सबसे खास बात ये थी कि हम आइस्क्रीम के पैसे जुगारने में माहिर हुआ करते । उन दिनों घर में शायद ही कबाड़ हुआ करते जिसे बेच हम आइस्क्रीम ले पाते । हम कौवे के घोंसले ढूंढा करते जिसमें अक्सर लोहे के तार , चम्मच और भी कुछ न कुछ हमारे काम की चीजें मिल ही जाया करती । काम बड़े हुनर और हिम्मत का हुआ करता । कौवे के झुण्डों और उसकी चोंच यानी लोल का सामना करते हुए घोंसले पर हाथ साफ कर लेना आसान नहीं था । काम तो यह ठीक नहीं था मगर यही काम ही था हमारा ।बर्फ खाकर किसकी जीभ कितनी लाल हुई यह देखकर ही विजेता का चुनाव हो जाया करता । बर्फ खाने के बाद पानी का अजीब स्वाद हमें एक नया खेल दे जाता । सुना है अब बर्फ वो रंग नहीं दे पाता । वो रंगीन बर्फ अब आइस्क्रीम पार्लरों में कैद होकर नए रंग में रंग चुकी है जो हमारी जीभ को रंगती नहीं । अब बर्फ सिर्फ खाया जाता है और वो खेल बंद है । वो दूध वाली आइस्क्रीम और नारियल के बुरादे अब नहीं मिलते । अब कौवों के घोंसले भी कहां दिखते हैं । अब तो घरों में कबाड़ भी काफ़ी होते हैं मगर वो डमरू बजाता हुआ बर्फवाला नहीं आता । बर्फवाले की घंटी अब बजती नहीं । बस दूर कहीं एक डमरू की डमडम और घंटी की टनटन बजती सी महसूस हुआ करती है । बात आज की गर्मियों की अब बदल चुकी है ।

(राजू दत्ता✍️)

Sunday, 21 March 2021

पुराना मकान

ठिकाने तमाम हों राहें जिंदगी में
सुकूं जिंदगी को मिलता है पुराने मकान में ।

रातें हुआ नहीं करती शहरों में
अच्छी नींद तो बस आती है गांव के बागान में।

भीड़ तमाम होती शहरों की दुकान में
अपने तो बस मिलते हैं पुराने मकान में ।

लाख ठंडे हो कमरे आलीशान
देते हैं सुकून पुराने ही मकान ।

ठिकाने तमाम हों राहें जिंदगी में
सुकूं जिंदगी को मिलता है पुराने मकान में ।

Friday, 19 March 2021

बुझे हुए पटाखे

बुझे हुए पटाखे 
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काली पूजा ही हमारे यहां दीपावली हुआ करती है । दुर्गा पूजा के ठीक २०वें दिन । दुर्गा पूजा पर मिले नए कपड़ों को दुबारा सहेजकर काली पूजा के लिए रख दिया जाता था । विजयादशमी का दिन हमारे लिए काफी खुशनुमा भी हुआ करता और उदासी लिए भी । खुशनुमा इसलिए कि उसी दिन बड़ों के पैर छूने पर पगड़ी यानी मेले घूमने के पैसे मिला करते और उदासी इसलिए कि मेला अब खत्म । दसों दिन खाली जेब मेला घूमने के बाद दशमी में कुछ नए सिक्कों की खन - खनाहट से हमारे चेहरे पर जो रौनक होती उसी की चकाचौंध से मेले गुलज़ार हुआ करते थे । दशमी के दिन नारियल के लड्डू और गुड़ वाली खोई  का नायाब स्वाद वो भी नए सिक्कों के भारीपन लिए हमारे लिए एक सल्तनत के सरदार होने जैसा हुआ करता । खैर दशमी की जादू भरी रात पलकों में बीत जाती और मेला सिमटने के कगार पर हुआ करता । 

अब हमें रौशनी के पर्व काली पूजा का बेसब्री का इंतजार हुआ करता । सच तो यही है कि हमें पूजा से ज्यादा बारूद की वो गमगमाती गंध लेने का ज्यादा ही इंतजार रहता । पटाखों में पैसे खर्च करने का हौसला उन दिनों बहुत ही कम लोगों को था । फिर भी बारूद की गंध जरूरी थी त्योहार को रंगीन करने के लिए । उन दिनों एक पैकेट नागिन छाप ही हमारे लिए बोनांजा पैकेज हो जाया करता था और हम करीने से एक - एक लड़ियां छुड़ा - छुड़ा कर पटाखे अलग किया करते ताकि पलीती न निकल जाए । एक - एक पटाखा हमारे लिए हीरे से भी कीमती हुआ करता । लंबी सी संठी के मुंह के सिरे पर पटाखा फंसाकर डिबिया की लौ से पटाखा फोड़ लेने का हुनर हमें बखूबी था । छुड़छुड़ी , रस्सी, अनार , लौकी , हाइड्रो बम , रेल , रॉकेट, बुलेट न जाने कितने तरह के साजों समान हुआ करते मगर नागिन की लड़ी ही हमारे खजाने का नूर हुआ करती । सांप तो हम रोजाना बनाया करते । एक काली से टेबलेट को जलाकर पूरा सांप निकाल लेना सपेरों को भी नहीं आता था जितना कि हमें । दुर्गा पूजा के खत्म होते ही हम कैंडल बनाने का काम शुरू कर देते । हम जिस कैंडल की बात कर रहे वो मोमबत्ती वाली नहीं बल्कि बांस की बत्ती के शानदार ढांचे पर रंगीन पन्नी और कागज़ की नक्काशी की कर रहे । बत्तीस काठी , चौसठ काठी , चांद , तारा , दिल , जहाज और भी न जाने कितने ही डिज़ाइन के । शाहिद चौक और बनिया टोला चौक पर ऐसे कैंडल की दुकानें सजा करती और हम भी एक कुशल व्यापारी की तरह कुछ सिक्के कमा लिया करते । ये सिक्के पटाखों पर खर्च के लिए कतई नहीं हुआ करते । हमारे दिमाग में यह बात बैठा दी गई थी कि पटखों को जलाने का मतलब पैसा ही जलाना है और शायद इसलिए हम औरों के बुझे हुए पटाखों से बारूद निकलकर उसका प्रयोग किया करते । अधजले और बुझे हुए पटाखे ढूंढना हमारे लिए अलीबाबा के ख़ज़ाने ढूंढने से कम नहीं था । काफ़ी दुष्कर कार्य हुआ करता था । बड़ों की नजरों में आए बिना सड़कों से पटाखे हल्के पांव में चुपके से दबाते हुए उठा लेना काफी हुनर का काम था । हमें बेइज्जती की फिकर नहीं थी । फिकर थी बस पिटे जाने और शिद्दत से चुने सारे पटाखे छीनकर फेंके जाने की । ख़ैर , हम किसी तरह अपना असला तैयार कर ही लिया करते । काली पूजा की देर रात से लेकर तड़के सुबह उठकर सारे बुझे हुए पटाखे हम चुन ही लिया करते और सात ही में अधजली मोमबत्तियां भी जिसे हम गला - गलाकर अलग - अलग रूप दे दिया करते । बुझे हुए पटाखे का बारीकी से परीक्षण कर हम अलग - अलग कर लेते । जिसमें कुछ भी जान बची होती उसे धूप में सुखाकर फोड़ने का प्रयास करते और बाकियों का बारूद निकलकर या तो बड़ा बम बना लिया करते या बारूद को ही सावधानी से सुलगाकर उसका अद्भुत रूप और गंध को महसूस करते । हम अकेले नहीं होते थे , पूरी की पूरी पलटन साथ हुआ करती । रातभर ओस में भींगे बुझे हुए पटाखे को जिंदा कर लेना हमें बखूबी आता था । अक्सर बारूद हमारी आंखों को अंधेर कर दिया करती मगर उसका एक अलग ही नायब अनुभव था जो बडे़ लोगों को तो कभी मयस्सर भी नहीं हुआ । हम पटाखे भले भी बुझे हुए इस्तेमाल किया करते मगर हम खुद तरोताज हुआ करते थे ।

कहते हैं दिवाली पैसे वालों की होती है मगर सच तो यही है कि दिवाली का दीया तो हमारे दिलों में बिना सिक्कों की खनक के ही बखूबी जला करता जिनकी रौशनी हमारे दिलों से निकलकर पूरे मुहल्ले को जगमगाया करती और शमां गुलज़ार हुआ करती ।
__________________________________________(राजू दत्ता ✍️)