Sunday, 5 July 2020

बाल - विद्यापीठ

बाल - विद्यापीठ

सफेद इस्तरी की हुई धोती, हल्के हरे रंग का खादी का कुर्ता और ऊपर से काले रंग का हाफ नेहरू जैकेट और लंबी और तीखी नाक पर मोटे फ्रेम वाला चश्मा पहने गौर वर्ण का दुबले-पतले  आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी जिनकी आवाज में इतनी टनक होती कि पूरे स्कूल को सुनाई पड़ जाती । उस शानदार व्यक्तित्व का नाम था - सच्चिदानंद दास, बाल विद्यापीठ का प्रधानाध्यापक । विद्यालय ही उनका घर था । पांचवी कक्षा का लकड़ी से घिरा कमरा और एक कुर्सी - टेबल और कुछ किताबों - स्टेशनरी के बोझ से दम तोड़ती लाचार अलमारी, बस यही थी उसकी जीवन भर की कमाई और जमापूंजी । चने के सत्तू का एक डब्बा और हॉर्लिक्स की बोतल यही था उनका किचन का सामान । स्कूल का चापाकल और शौच - घर ही उनके लिए पर्याप्त था । एक रस्सी पर सूखती सफेद रंग की धोती की दिव्य सफेदी मानस पटल पर आज भी तरोताजा है । प्रधानाध्यापक के साथ साथ वे पांचवी कक्षा के प्राचार्य भी थे । पतले बांस की करची से न जाने कितने लोगों का भविष्य रच डाला था उस असाधारण व्यक्ति ने ।

उस जमाने में भी उस विद्यालय में लड़के लड़कियों में विभेद नहीं था । सब साथ - साथ पढ़ते थे । कक्षा 1- बी के टीचर थे श्रीवास्तव सर,  1- ए के महेंद्र सर 1 के राजेंद्र सर , दो के राय सर , 3 के  शर्मा सर , 4 के  कमलू सर और पांच के स्वयं सच्चिदानंद सर ।

श्रीवास्तव सर सूखे पेट की भी चमड़ी पकड़कर सजा देने में माहिर थे,  तो राजेंद्र सर के पहाड़े की क्लास में शायद ही कोई उनकी बेंत की मार से  बचा हो ।  राय सर का नाम ही खौफ के लिए काफी था और वो सेकेंड सर के नाम से हमारे बीच मशहूर थे । शर्मा सर कानों के नीचे बाल खींच कर सीधा कर देते और कमलू सर पूरे सर के बाल खींचकर शरीर तक को उठा लेने का सामर्थ रखते थे । सच्चिदानंद सर तो प्रिंसिपल ही थे । टी. सी. के नीचे बाद भी बेमानी थी ।

पठन- पाठन से ज्यादा महत्व बिगडों को सुधारने पर था, जिसका भरपूर ज्ञान शिक्षकों को था । उन दिनों स्कूल में पिटने का मतलब घर पर भी धुलाई थी, आज की तरह हमें उतनी तवज्जो नहीं दी जाती थी । स्कूल ना जाने का कोई बहाना काम नहीं करता था। शिक्षक स्वयं घर आकर हमें उठा ले जाते थे । उन दिनों घड़ियां भी घरों में कम होती थी । जूट मील का  साढ़े नौ बजे के सायरन से डरावनी आवाज आजतक नहीं सुनी । पहली सायरन बजते ही खौफ का मंजर होता शुरू होता । घसीटकर स्कूल भेजने की तैयारी की जाती । चारों तरफ रुदन  और हाहाकार फैला होता। पौने दस बजे के सायरन पर रुदन का जोर और भी परवान चढ जाता और दस बजे के सायरन के साथ हमें किसी तरह घसीटकर स्कूल पहुंचा ही दिया जाता, जहां पहुंचकर सब कुछ सामान्य हो जाने की नियति से हम भय वश  समझौता करने को विवश थे।

आज भी वो जूट मील की सायरन और स्कूल की घंटियों की टनटनाहट कानों में गूंजती रहती है । स्कूल में टिफिन ले जाने की परंपरा नहीं थी । टिफिन के समय भी ठीक डेढ़ बजे जूट मील का सायरन बजता और इधर ही स्कूल की घंटी । दो बजे फिर घर से खाना खाकर आने की असहनीय पीड़ा किसे याद नहीं होगी । चार बजे छुट्टी होती थी । छुट्टी की घंटी का संगीत का आनंद मोक्ष के आनंद पर भी भारी था । 26 जनवरी और 15 अगस्त को केवल चॉकलेट बंटने की नाखुशी आज भी बरकरार है। जलेबियां न बटने का कष्ट काफी दुष्कर था । शानदार पढ़ाई के पीछे शानदार दंड- विधान का महत्वपूर्ण योगदान था । हर एक शिक्षक के दंड - विधान का अपना एक अलग ही तरीका था । मुर्गी बनाना, मुर्गा बनाना ,कान पकड़ कर बेंच पर खड़ा होना और हंसना भी नहीं, पीठ पर ईंट रखना, धूप में खड़ा करना ,क्लास में झाड़ू लगाने और उंगलियों के बीच पेंसिल डालकर उंगलियों को दबाकर पेंसिल को धीरे - धीरे घुमाकर सजा जैसा दंड सामान्य था । 

बारिश के मौसम में स्कूल की छतों से टपकता पानी, उन दिनों हमें एक खेल सा लगता था ।हमें शायद यह नहीं पता था कि यह महज  टपकता पानी ही नहीं बल्कि कुछ और ही था । शायद कम अर्थों के बोझ के कष्ट का रुदन था वो । हमारी फीस काफ़ी काम थी और उसपर भी कम लोग ही समय पर फीस दे पाते थे ।जर्जर अर्थवयवस्था ने स्कूल की नीव के साथ - साथ छतों को भी यातना दे दे कर उसे तोड़ दिया था ।

वार्षिक परीक्षा के समापन के बाद परिणाम घोषित होने वाले दिन में मुख्य अतिथि हर बार एक ही होते थे । वो थे - डॉक्टर दौलतराम ढंड। प्रथम , द्वितीय और तृतीय स्थान लाने वाले छात्रों को एक कलम प्रदान की जाती थी ।

समय की मार और धन के अभाव में वह देवालय एक बार दो हिस्सों में बट गया और वह पुराना और अमूल्य विद्यालय खाली हो गया और खाली हो गई हमारी अंतरात्मा । यह बंटवारा हमारी अनगिनत सुनहरी यादों का था, उन अमूल्य भावनाओं का था जिनकी जड़ें उसके  प्रांगण में आज भी जीवित है और प्रतीक्षारत भी ।आज भी अनायास ही कदम उस तरफ जाकर ठहर जाते हैं । नीले अक्षरों में स्कूल का धुंधला सा नाम आज भी अपनी गौरवपूर्ण दास्तां बयां कर रहा है। स्कूल की घंटी की जगह घिसावट का निशान आज भी ज्यों की त्यों है । स्कूल का वह प्रांगण आज कचरों से भरा है, जहां कल न जाने कितने सुंदर-सुंदर फूल खिले होते थे । स्कूल का वह चापाकल जो कभी न थकता था आज निस्तेज होकर सूखा पड़ा है । कानों में वो शोर अब भी गूंज रहा  पर कोई वहां नहीं है । स्कूल के सामने चाट वालों का खोमचा, झालमुड़ी वाले का पिटारा और खट्टे - मीठे मौसमी फलों की टोकरियां अब नहीं सजती। चाट की खट्टी खुशबू और  झालमुड़ी की तीखी महक अब भी जस की रस ताज़ी है जेहन में । कैलाश चाचा की चाय की दुकान भी अब बंद हो चुकी है , जहां न जाने कितने चाय और बिस्कुट हम खाते रहे। ब्रह्म मुहूर्त में सदा खुलने वाला वह दुकान अब सदा के लिए बंद था । हम आगे निकल आए और वह सब कुछ पीछे छूट गया । कुछ गुरुदेव अब नहीं रहे और जो है बिल्कुल भी ना बदले । रायसर , कमलू सर राजेंद्र सर और श्रीवास्तव सर से मुलाकात होती रहती है । इन गुरुओं ने हमें अपने रक्त से पोषित किया है, हमें जीवंत बनाए रखा है। इनका ऋण जन्म - जन्मांतर में नहीं चुकाया जा सकता । काश मैं इतना अमीर होता कि उस पुराने खंडहर हो चुके स्कूल को खरीद पाता और दोबारा उस सूख चुके उपवन को सींचकर जीवंत कर पाता। मेरी दृष्टि में इससे बड़ी गुरूदक्षिणा और कोई नहीं होती । गुरु - पूर्णिमा के पावन उपलक्ष्य पर उन सभी गुरुओं को मेरा सहृदय आत्मिक नमन है, जिन्होंने निस्वार्थ अपने रक्तो से हमें सींचकर हमें मजबूत शिक्षा और संस्कारों से अभिभूत किया है ।

(राजू दत्ता ✍️)

Tuesday, 30 June 2020

घिसी चप्पल

पूरी तरह घिसी हुई नेपाली चप्पल जिसके भीतर के परतों का रंग भी अंगुलियों की लगातार घर्षना से बाहर आने को शेष न बची हो । इस पूरी तरह घिसी चप्पल ने अपनी परत दर परत को उधेरकर मानो अपना वक्ष फाड़कर सबकुछ दिखा देने का निश्चय कर रखा था । कुछ शेष न बचा था अब छिपाने को । वक़्त के थपेड़ों ने उस चप्पल को जर्जर से जर्जरतम अवस्था में लाने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी । कई तरफ़ से फैल चुकी उसकी फीतों का आकार चीख - चीख कर यह बता रहा था कि लगातार धूप और बारिश में फटे पांव और चप्पल को जोड़े रखने के प्रयास ने उसे लगातार बार - बार कितनी असहनीय पीड़ा दी थी । फीते के पस्त होते हौसले को कहीं - कहीं से आलपिन लगाकर बुलंद करने की कोशिश की गई थी । न जाने कितनी कीलों को अपने जेहन में छिपाए वह जर्जर चप्पल अब भी घिसी जा रही थी । चलते - चलते फीते के अगले सिरे का बार - बार खुल जाना मानो उसकी बार - बार उखड़ती सांसों का आभास दे रही होती । उस जर्जर चप्पल ने मानो न जाने कितना बोझ उठा रखा था । बोझ था उस जर्जर होते शरीर का जिसने उसको धारण कर रखा था । उस कंकलरूपी शरीर को देख यह कतई नहीं कहा जा सकता कि उसके लेशमात्र बोझ से चप्पल इतना घिस सकता है । नहीं , यह इसके बोझ से इतना नहीं घिस सकता । जरूर यह बोझ जर्जर होते उस शरीर की उस भारी और वजनी आत्मा का था जिसने सारे समाज की अवहेलना, दुत्कार , तिरस्कार और भी न जाने कितने अनगिनत निष्ठुर और भारी भावों जैसे अनंत बोझ को उठा रखा था । उसकी चप्पल निश्चय ही उसके शारीरिक बोझ से नहीं बल्कि उसकी आत्मा के उसी अनंत भार से घिस  - घिस कर अपनी एक - एक परतों में उस असीम संघर्ष और संतापों को तह करके संजोए हुए था । वह चप्पल अपने आप में समस्त समाज का बोझ लिए पूरे समाज को प्रतिबिंबित कर रहा था ।
(राजू दत्ता ✍️)

Monday, 29 June 2020

अमर बाबू

*अमर बाबू की मुहब्बत तो देखो , अपना नाम में भी रंजन लगा रखा है - विवेक रंजन का आधा नाम ले लिया है । बहुत छुप छुप के देशी घी का ठेकुआ छांका है अमर बाबू ने विवेक बाबू के लिए । बहुत गहरा रिश्ता है । जबसे विवेक बाबू का बिहा हुआ , अमर बाबू की जिंदगी में तूफ़ान आ गया । उस दिन दिलजले का दिल जला था धुआं धुआं होकर और राख अब भी रह रह के धधक उठता है । अब रंजन नाम काटने को दौड़ता है । मगर ठेकुआ अब भी देशी घी का बार बार छनता है और और बार बार दिल तार तार होता है । महुआ के मौसम में दरद का परवान माथा में चढ़ कर नाचता है और अमर बाबू का अमर प्रेम धुआं धुआं होकर बहुत दूर आसमान में उड़ता चला जाता है , उड़ता चला जाता है और उधर विवेक बाबू देशी घी का ठेकुआ - नीमकी फूल क्रीम वाला दूध के चाय में आमलेट के साथ कम्बल ओढ़ के मजा से खाता रहता है । विवेक बाबू बेवफ़ा निकला ।*
(उपन्यास का एक अंश)

Saturday, 27 June 2020

मन की बात

'मन का बात' बोला जाता सुना नहीं । आम जनता का मन का बात त उसका कनिया भी नहीं सुनता तो फिनु ख़ास आदमी कहे सुने । आम जनता खाली आम बेचता है और खास जनता बात बेचकर आम जनता से आम कीनता है और खाली आम का सेक पीता है और फिर गुठली फेक देता है और फिर आम जनता वही गुठली से या तो पॉपी बनाकर बजाता है या फिनू से आम का गाछ उगाता है और फीनू से आम बेचता है । यही चक्कर चलता रहता है । ✍️

शेष

अपने ही तानों बानों में हम उलझ बैठे
बना पेंच जीवन को हम खुद उलझ बैठे
जानकर सत्य सभी फिर भी सब लुटा बैठे
गिनती की सांसों को यूं ही गवां बैठे 
अपने ही तानों बानों में हम उलझ बैठे ।

छोड़ रौशनी सूरज की अंधेरे में सिमट बैठे 
बहती हवाओं को यूं ही शोर समझ बैठे 
दौड़ दिवा - सपनों की सत्य समझ बैठे
छलावे को ही सत्य समझ बैठे 
अपने ही तानों बानों में हम उलझ बैठे ।

टिप - टिप गिरती बूंदों को व्यर्थ शोर समझ बैठे 
सिक्कों की खन - खन को संगीत समझ बैठे 
सीधे - सादे जीवन को बेकार समझ बैठे
अपने ही तानों बानों में हम उलझ बैठे ।

समय शेष है , बाकी है सांसे 
खुले आसमां के नीचे 
बिना मूल्य के, बिना उलझन के 
सत्य सदा ही भरा रहा , संगीत सदा ही गूंज रहा 
कर लो निर्मुल्य आलिंगन इसका 
कुछ ही जीवन शेष रहा ।

Wednesday, 24 June 2020

संताप

बहुत रौशनी है आज इस मुकम्मल जहां में
मगर न जाने वो निगाहें कहां चली गईं
ढूंढ लेती थी हर वो तलाश मन की 
मगर जाने वो लोग कहां चले गए ।

चकाचौंध है आंखें इस गहरी रात में भी 
मगर न जाने वो टिमटिमाती डिबिया कहां चली गई
देती थी जरूरत भर रौशनी आंखों को 
मगर जाने वो शीतल रौशनी कहां चली गई ।

बहुत उजाले हैं आज गहरी रातों में भी 
मगर जाने वो रौशनी कहां चली गई 
बनते थे काजल उन कलिखों से भी 
मगर जाने वो आंखों का नूर कहां चला गया ।

आज सफेद रौशनी की चादर है, न ताप है न धुआं
अब हवा के झोंको से संघर्ष नहीं, बस मन का ताप है 
टिमटिमाना , बुझते हुए फिर जलना अब नियति नहीं 
अब केवल संताप है , जाने वो ताप कहां चला गया ।

Monday, 1 June 2020

बड़का चुनाव, छोटका लोग

"आपका भोट कीमती है " इसको बेरबाद नहीं करना है। मोहर मारो तान के हमरा छाप पेहचान के। अबकी बार हमरी सरकार। जात पे न पात पे मोहर मारो सीना तान के। आप हमको भोट दो , हम आपको आजादी। इ सब के हल्ला गुल्ला औरो शोर शराबा से बार  बार लोकतंत्र जिन्दा होता है और औरो इलेक्शन के बाद कुपोषित होकर फिर मर जाता है। यही भारत का कभी न मरने वाला लोकतंत्र है और सारा दुनिया भारत का अमर लोकतंत्र का पुनर्जीवन देखकर दांतो तले ऊँगली दबाकर अपना अपना ऊँगली काट खाता है। ऐसे थोड़े न भारत एक सशक्त लोकतंत्र है औरो इसका चुनाव दुनिया का सबसे बड़का औरो अजूबा मेला है। इ मेला का मेन बाजार गांव में ही तो लगता है औरो पंचायत चुनाव तो दुनिया का सबसे बड़का चुनाव से भी बड़का होता है। आखिर पंचायती राज व्यवस्था ही तो लोकतंत्र का बीज होता है।  आज अगर मार्क्स औरो लेनिन जिन्दा होता तो इ चुनाव देखकर उसका सीना चौड़ा हो जाता। नयका आमिर - पुरनका गरीब , छोटका आदमी - बड़का आदमी , शोषक -शोषित , जनाना- जननी , कुकुर - बिलाय सब के सब  को बिना कोनो भेद - भाव के इस मेला में एक्के पिलेट में एक साथ पीला - पीला चाट औरो  झाल-झाल   घुपचुप औरो गुलाबी - गुलाबी जलेबी पेलते देख लेनिन औरो माओत्सेतुंग तो ख़ुशी से पगला गए होते।  क्या मंदिर , क्या मस्जिद , क्या गिरजा , क्या गुरुद्वारा सब जगह चौपाल में खचा- खच लोग अड्डा जमा देश के भविष्य पर चिंता में पगलाइल रहते है। "धर्म अफीम है " इ बात भारत में लागु नहीं है इ मार्क्स को पता नहीं था। भारत में धरम का मतलब अलग है। यहाँ धरम भी साम्यवादी चद्दर ओढ़कर सब पूंजपति लोगन का खर्चा - पानी से जिन्दा है। यहाँ बड़का आदमी मंदिर बनवाता है और छोटका लोग पूजा करता है और ' जेहि विधि रखे राम , का कीर्तन करते रहता है।  चाय औरो पान के दुकान के भीड़ देख , चीन -अमेरिका का भी माथा घूम जाता है और जिनपिंग औरो ट्रम्प दोनों सोच में पड़ जाते कि काहे न चाय और पान का दुकान खोले। चाय का स्कोप तो दुनिया देख ही लिया है। सैलून में तो सरकार गिरा - गिरा कर उठाते -उठाते लोग सब थक हारकर बीड़ी जलाकर अपना कलेजा सकते रहते हैं। सैलून अपना पीला दाँत निपोरे संसद को अपने दाँत के बीच का बड़का छेद दिखा - दिखा कर पानी -पानी कर देता है।

बड़ा सुहाना मौसम होता है। औरो हर आदमी अपना  भोट महा कीमती होने के अहसास मात्र से धन्ना सेठ को भी पानी पीला देता है। " आपका भोट कीमती है " इसका असली मतलब सारा दुनिया में यहीं लोग जानता है । बेइज्जत से बेइज्जत आदमी का भी कोनो इज्जत होता है यह चुनाव ही सिद्ध करता है। चुनाव के मौसम में कोनो आदमी बुरबक नहीं होता।  चुनाव बिना किसी भेद भाव के सबको बराबर समझता है।  असली साम्यवाद चुनाव के समय ही दीखता है। बिना कोनो क्रांति के साम्यवाद चुनाव में कुकुरमुत्ता के जइसन पनप जाता है जिसके खातिर मार्क्स अपने बच्चा लोग को भूख से मरने छोड़ दिया था।  उप्पर बैठकर मार्क्स सोच में पड़ जाता है कि भारत में क्रांति किये होते तो जच्चा बच्चा औरों उनका जच्चा बच्चा और फिनु उनका जच्चा बच्चा सब जिन्दा होता औरो आम जनता का आम का गुद्दा और जूस पीकर उसका गुठली उछाल उछाल कर आम जानता को लुटा देता और आम जानता एक समान रूप से चैन से उसका पॉपी बजाकर मस्त रहता।

यहाँ चुनाव मुद्दा पर नहीं होता , गुद्दा पर होता है। जिसका जितना बड़का गुद्दा , जीत उसका पक्का। इ बात पर दुनिया भर का राजनीती के जानकर रिसर्च कर रहा है और अभी तक गुद्दा का माने जान नहीं पाए हैं। कितना लोग तो उप्पर जाकर भी शोध में लगे हैं। गुद्दा क्या है ? कहाँ होता है ? कोनो ग्रन्थ में इसका जिकर नहीं।  इ एक गूंगे का गुर है और सब यहाँ गूंगा - बहरा ही तो है। 

नौजवान , देश कि शान , अपन - अपन बाइकवा झाड़ - पोछकर रेडी कर लेता है जिसका टंकी भी लोकतंत्र का रस पीकर फिर से जिन्दा होने के उम्मीद में कैंडिडेट लोगन का बाट जोहने लगते हैं। इ अलग बाट है कि टंकी को पेट्रोल पीकर ही काम चलाना होता है और रस चलाने वाला पी जाता है। टंकी फूल औरो कैंडिडेट का पैसा का बीड़ी - सिगरेट से हर फ़िक्र को धुंए में उडाता चला जाता नौजवानों का जत्था। क्या नौजवान , क्या बुड्ढा सब का सब शाम तक  लोकतंत्र का बोझा उठाते - उठाते थक कर चूर होकर दारू से ही अपना शरीर का दरद मिटा पाते हैं। दारू शौक थोड़े है , मज़बूरी है। लोकतंत्र इतना भी गरीब नहीं कि जान ले ले आम आदमी का।  दवा नहीं दे सकता तो क्या आम आदमी को दरद से मरने दे ? तो फिर दारु देता है। ठीक वैसे जैसे घर में भात नहीं बनने पर मां बगल वाला घर से माड़ मांगकर अपना बच्चा का भूख शांत करता है। फिर दारू खली पेट थोड़ो न भरता है , मन को भी भर देता है और सबको समान भाव से भर देता है। अगर दारू का महत्व मार्क्स और लेनिन को पता होता तो इतना लहू लुहान क्रांति का कोनो जरुरत नहीं था।  बस दारू पियो , दारू पिलाओ  अहिंसक आंदोलन से काम हो जाता।

फिर जाति भी कहाँ अपने त्याग बलिदान से पीछे हटे ? सब जाति अलग - अलग झुण्ड बनाकर लोकतंत्र का पौआ पकड़ कर उसको औरो मजबूत करने के लिए अपने - अपने तरफ से सबसे सियाना आदमी चुनकर तैयार कर लेता है जो उसके कीमती वोट का ठीक - ठाक कीमत लगाने का सबसे मेन रोल निभा सके। गांव का गांव छोटे - छोटे जातीय कबीलों में बंटकर कबीलामय होकर वैदिक काल के कबीलाई ढांचा की मान्यता को पुष्ट करता इस चुनावी उत्सव में बड़े जोशो - खरोश औरो होशियारी से भाग लेकर लोकतंत्र की लाज बचाने का दायित्व निभाता है।  राजनीतीक जागरूकता के हिसाब से दिल्ली भी इन गावों के आगे पानी मांगते नजर आते हैं।  राजनीती ने इन गावों को क्या दिया ये तो शोध का विषय है मगर इन गावों ने इन गावों ने राजनीती को यह पूरा भरोसा दिया है कि हम हर बार भले ही ठगे जाएँ , पर हर नए चुनाव को हम गांव नयी उम्मीद से देखेंगे और नए रेट पर सलटेंगे और शायद इसी पक्के भरोसे का ही तो करिश्मा है कि भारत में लोकतंत्र आज भी चैन कि नींद सो रहा है और अरस्तु के उस कथन को कि " लोकतंत्र मूर्खों का शासन है" को दांत निपोरे चिढ़ा रहा है।  लोग अपना सब कुछ लुटा लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिए बिना किसी लिंग भेद के आदमी औरत का भोट और औरत आदमी का भोट देकर एक भी कीमती भोट बेरबाद नहीं करता। कई मतदाता तो बरसों पहले स्वर्ग जा चुके लोगों के नाम पर भी भोट देकर स्वर्ग में भी उनकी आत्मा कि लाज बचा लेते हैं और आत्मा अमर है और शरीर नश्वर है को चरितार्थ कर जाते हैं।  यहाँ लोकतंत्र कि जड़ें कितनी गहरी है यह लोकतंत्र को भी नहीं पता मगर इनकी शाखा स्वर्ग तक जाती है ये बच्चा-बच्चा जानता है।

भारत का लोकतंत्र क्युकी विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो इसके हिसाब से इसका पेट भी सबसे बड़ा है और चुनाव के समय ही यह कुम्भकर्णी नींद से जगता है और मानो सबकुछ डकार जाने को तैयार रहता है और इसका पेट तो अंत में भरता है - खस्सी के मीट से और प्यास बुझती है दारू से।

[राजू दत्ता]✍🏻✍🏻✍🏻