Wednesday, 24 June 2020

संताप

बहुत रौशनी है आज इस मुकम्मल जहां में
मगर न जाने वो निगाहें कहां चली गईं
ढूंढ लेती थी हर वो तलाश मन की 
मगर जाने वो लोग कहां चले गए ।

चकाचौंध है आंखें इस गहरी रात में भी 
मगर न जाने वो टिमटिमाती डिबिया कहां चली गई
देती थी जरूरत भर रौशनी आंखों को 
मगर जाने वो शीतल रौशनी कहां चली गई ।

बहुत उजाले हैं आज गहरी रातों में भी 
मगर जाने वो रौशनी कहां चली गई 
बनते थे काजल उन कलिखों से भी 
मगर जाने वो आंखों का नूर कहां चला गया ।

आज सफेद रौशनी की चादर है, न ताप है न धुआं
अब हवा के झोंको से संघर्ष नहीं, बस मन का ताप है 
टिमटिमाना , बुझते हुए फिर जलना अब नियति नहीं 
अब केवल संताप है , जाने वो ताप कहां चला गया ।

Monday, 1 June 2020

बड़का चुनाव, छोटका लोग

"आपका भोट कीमती है " इसको बेरबाद नहीं करना है। मोहर मारो तान के हमरा छाप पेहचान के। अबकी बार हमरी सरकार। जात पे न पात पे मोहर मारो सीना तान के। आप हमको भोट दो , हम आपको आजादी। इ सब के हल्ला गुल्ला औरो शोर शराबा से बार  बार लोकतंत्र जिन्दा होता है और औरो इलेक्शन के बाद कुपोषित होकर फिर मर जाता है। यही भारत का कभी न मरने वाला लोकतंत्र है और सारा दुनिया भारत का अमर लोकतंत्र का पुनर्जीवन देखकर दांतो तले ऊँगली दबाकर अपना अपना ऊँगली काट खाता है। ऐसे थोड़े न भारत एक सशक्त लोकतंत्र है औरो इसका चुनाव दुनिया का सबसे बड़का औरो अजूबा मेला है। इ मेला का मेन बाजार गांव में ही तो लगता है औरो पंचायत चुनाव तो दुनिया का सबसे बड़का चुनाव से भी बड़का होता है। आखिर पंचायती राज व्यवस्था ही तो लोकतंत्र का बीज होता है।  आज अगर मार्क्स औरो लेनिन जिन्दा होता तो इ चुनाव देखकर उसका सीना चौड़ा हो जाता। नयका आमिर - पुरनका गरीब , छोटका आदमी - बड़का आदमी , शोषक -शोषित , जनाना- जननी , कुकुर - बिलाय सब के सब  को बिना कोनो भेद - भाव के इस मेला में एक्के पिलेट में एक साथ पीला - पीला चाट औरो  झाल-झाल   घुपचुप औरो गुलाबी - गुलाबी जलेबी पेलते देख लेनिन औरो माओत्सेतुंग तो ख़ुशी से पगला गए होते।  क्या मंदिर , क्या मस्जिद , क्या गिरजा , क्या गुरुद्वारा सब जगह चौपाल में खचा- खच लोग अड्डा जमा देश के भविष्य पर चिंता में पगलाइल रहते है। "धर्म अफीम है " इ बात भारत में लागु नहीं है इ मार्क्स को पता नहीं था। भारत में धरम का मतलब अलग है। यहाँ धरम भी साम्यवादी चद्दर ओढ़कर सब पूंजपति लोगन का खर्चा - पानी से जिन्दा है। यहाँ बड़का आदमी मंदिर बनवाता है और छोटका लोग पूजा करता है और ' जेहि विधि रखे राम , का कीर्तन करते रहता है।  चाय औरो पान के दुकान के भीड़ देख , चीन -अमेरिका का भी माथा घूम जाता है और जिनपिंग औरो ट्रम्प दोनों सोच में पड़ जाते कि काहे न चाय और पान का दुकान खोले। चाय का स्कोप तो दुनिया देख ही लिया है। सैलून में तो सरकार गिरा - गिरा कर उठाते -उठाते लोग सब थक हारकर बीड़ी जलाकर अपना कलेजा सकते रहते हैं। सैलून अपना पीला दाँत निपोरे संसद को अपने दाँत के बीच का बड़का छेद दिखा - दिखा कर पानी -पानी कर देता है।

बड़ा सुहाना मौसम होता है। औरो हर आदमी अपना  भोट महा कीमती होने के अहसास मात्र से धन्ना सेठ को भी पानी पीला देता है। " आपका भोट कीमती है " इसका असली मतलब सारा दुनिया में यहीं लोग जानता है । बेइज्जत से बेइज्जत आदमी का भी कोनो इज्जत होता है यह चुनाव ही सिद्ध करता है। चुनाव के मौसम में कोनो आदमी बुरबक नहीं होता।  चुनाव बिना किसी भेद भाव के सबको बराबर समझता है।  असली साम्यवाद चुनाव के समय ही दीखता है। बिना कोनो क्रांति के साम्यवाद चुनाव में कुकुरमुत्ता के जइसन पनप जाता है जिसके खातिर मार्क्स अपने बच्चा लोग को भूख से मरने छोड़ दिया था।  उप्पर बैठकर मार्क्स सोच में पड़ जाता है कि भारत में क्रांति किये होते तो जच्चा बच्चा औरों उनका जच्चा बच्चा और फिनु उनका जच्चा बच्चा सब जिन्दा होता औरो आम जनता का आम का गुद्दा और जूस पीकर उसका गुठली उछाल उछाल कर आम जानता को लुटा देता और आम जानता एक समान रूप से चैन से उसका पॉपी बजाकर मस्त रहता।

यहाँ चुनाव मुद्दा पर नहीं होता , गुद्दा पर होता है। जिसका जितना बड़का गुद्दा , जीत उसका पक्का। इ बात पर दुनिया भर का राजनीती के जानकर रिसर्च कर रहा है और अभी तक गुद्दा का माने जान नहीं पाए हैं। कितना लोग तो उप्पर जाकर भी शोध में लगे हैं। गुद्दा क्या है ? कहाँ होता है ? कोनो ग्रन्थ में इसका जिकर नहीं।  इ एक गूंगे का गुर है और सब यहाँ गूंगा - बहरा ही तो है। 

नौजवान , देश कि शान , अपन - अपन बाइकवा झाड़ - पोछकर रेडी कर लेता है जिसका टंकी भी लोकतंत्र का रस पीकर फिर से जिन्दा होने के उम्मीद में कैंडिडेट लोगन का बाट जोहने लगते हैं। इ अलग बाट है कि टंकी को पेट्रोल पीकर ही काम चलाना होता है और रस चलाने वाला पी जाता है। टंकी फूल औरो कैंडिडेट का पैसा का बीड़ी - सिगरेट से हर फ़िक्र को धुंए में उडाता चला जाता नौजवानों का जत्था। क्या नौजवान , क्या बुड्ढा सब का सब शाम तक  लोकतंत्र का बोझा उठाते - उठाते थक कर चूर होकर दारू से ही अपना शरीर का दरद मिटा पाते हैं। दारू शौक थोड़े है , मज़बूरी है। लोकतंत्र इतना भी गरीब नहीं कि जान ले ले आम आदमी का।  दवा नहीं दे सकता तो क्या आम आदमी को दरद से मरने दे ? तो फिर दारु देता है। ठीक वैसे जैसे घर में भात नहीं बनने पर मां बगल वाला घर से माड़ मांगकर अपना बच्चा का भूख शांत करता है। फिर दारू खली पेट थोड़ो न भरता है , मन को भी भर देता है और सबको समान भाव से भर देता है। अगर दारू का महत्व मार्क्स और लेनिन को पता होता तो इतना लहू लुहान क्रांति का कोनो जरुरत नहीं था।  बस दारू पियो , दारू पिलाओ  अहिंसक आंदोलन से काम हो जाता।

फिर जाति भी कहाँ अपने त्याग बलिदान से पीछे हटे ? सब जाति अलग - अलग झुण्ड बनाकर लोकतंत्र का पौआ पकड़ कर उसको औरो मजबूत करने के लिए अपने - अपने तरफ से सबसे सियाना आदमी चुनकर तैयार कर लेता है जो उसके कीमती वोट का ठीक - ठाक कीमत लगाने का सबसे मेन रोल निभा सके। गांव का गांव छोटे - छोटे जातीय कबीलों में बंटकर कबीलामय होकर वैदिक काल के कबीलाई ढांचा की मान्यता को पुष्ट करता इस चुनावी उत्सव में बड़े जोशो - खरोश औरो होशियारी से भाग लेकर लोकतंत्र की लाज बचाने का दायित्व निभाता है।  राजनीतीक जागरूकता के हिसाब से दिल्ली भी इन गावों के आगे पानी मांगते नजर आते हैं।  राजनीती ने इन गावों को क्या दिया ये तो शोध का विषय है मगर इन गावों ने इन गावों ने राजनीती को यह पूरा भरोसा दिया है कि हम हर बार भले ही ठगे जाएँ , पर हर नए चुनाव को हम गांव नयी उम्मीद से देखेंगे और नए रेट पर सलटेंगे और शायद इसी पक्के भरोसे का ही तो करिश्मा है कि भारत में लोकतंत्र आज भी चैन कि नींद सो रहा है और अरस्तु के उस कथन को कि " लोकतंत्र मूर्खों का शासन है" को दांत निपोरे चिढ़ा रहा है।  लोग अपना सब कुछ लुटा लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिए बिना किसी लिंग भेद के आदमी औरत का भोट और औरत आदमी का भोट देकर एक भी कीमती भोट बेरबाद नहीं करता। कई मतदाता तो बरसों पहले स्वर्ग जा चुके लोगों के नाम पर भी भोट देकर स्वर्ग में भी उनकी आत्मा कि लाज बचा लेते हैं और आत्मा अमर है और शरीर नश्वर है को चरितार्थ कर जाते हैं।  यहाँ लोकतंत्र कि जड़ें कितनी गहरी है यह लोकतंत्र को भी नहीं पता मगर इनकी शाखा स्वर्ग तक जाती है ये बच्चा-बच्चा जानता है।

भारत का लोकतंत्र क्युकी विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो इसके हिसाब से इसका पेट भी सबसे बड़ा है और चुनाव के समय ही यह कुम्भकर्णी नींद से जगता है और मानो सबकुछ डकार जाने को तैयार रहता है और इसका पेट तो अंत में भरता है - खस्सी के मीट से और प्यास बुझती है दारू से।

[राजू दत्ता]✍🏻✍🏻✍🏻

Thursday, 21 May 2020

चाय की चुस्की

बाबा बहुत चाय पीते थे । हर वक़्त चाय चाहिए होती थी। चाय की एक केतली हर वक़्त चूल्हे पर हुआ करती और मां बिना ब्रांड वाली कोई सी भी चायपत्ती डालकर चाय बनाती रहती । चाय हमारे लिए केवल एक पेय ही नहीं था बल्कि रोटी खाने का एक माध्यम भी था । बहुत बचपन से हम भाई बहनों को भी चाय चाहिए होता था । सुबह मुंह हाथ धोते ही हमें चाय की एक प्याली के साथ रात की बची रोटी नमक - तेल से मिलाकर रोल बनाकर दी जाती और उसी चाय में डुबोकर हम उसे बड़ी चाव से खाया करते । गरमा गरम रोटी हमें पसंद नहीं थी इसीलिए रात को ही ज्यादा रोटियां सेककर रख दी जाती । बासी रोटी वो भी नमक तेल लगी का चाय के साथ का जायका आज भी ताज़ा है । फ़िर शाम को चाय - मूढ़ी का मजा लेना । बाटी में चाय और उसमें तैरती मूढ़ी को चम्मच से निकालकर उसे खाना बड़े संयम और अनुभव का काम था जिसे हम बख़ूबी जानते थे । अक्सर शाम को चाय रोटी ही खाकर सोना होता था । दूध रोटी हमें रास न आता था चाहे उसके पीछे जो भी वजह रही हो । दूध भी बस चाय की असली काली रंगत को बस थोड़ा गोरा रंग ही देने के लिए डाला जाता । आज वाली फूल क्रीम की चाय नहीं होती थी । आग में जली - जली सी काली केतली ने ही हमारे बचपन को अपना रंग दिया था । चाय ने ही हमें बड़ा किया । फिर ट्यूशन पढ़ाने का दौर आया तो जैसे चाय मानो जिंदगी से और भी जुड़ती चली गई । जिस घर में जाओ वहीं एक कप प्याली चाय के साथ नमकीन बिस्कुट और कभी दालमोठ । 

दोस्तों के साथ तरके सबेरे उठकर सैर पर जाना और गुटका बिस्कुट का पूरा पैकेट और मिट्टी की भांड में चाय की चुस्की और अंतहीन बातों का दौर । कभी शहीद चौक पर राजू भैया की गहरी चाय , कभी पी. एन. टी. चौक पर शाम की चाय । ओ. टी. पारा शिव मंदिर के पास की गुमटी की चाय की यादें । दुर्गा स्थान चौक की बिल्कुल अलग स्वाद वाली चाय का जायका वो भी इलायची वाली कौन भूल सकता । शिव - मंदिर चौक पर अशोक भैया की चाय और साथ में उनका व्यव्हार अंतर्मन में आज भी ताज़ी है । मिर्चाईबाड़ी चौक के पास डब्बू भैया की दिलकश चाय का जोड़ कहां ? शाम को रेलवे फिल्ड की नींबू वाली चाय और दोस्तों की भीड़ और राजीव बाबा की कभी न खत्म होने वाली गुफ्तगू और अलौकिक ज्ञान का वो दौर किसे याद न होगा ? चाय के साथ गोकुल स्वीट्स की निमकी का स्वाद कैसे फीका हो सकता है । बड़ा बाज़ार और रबिया होटल का चाय और समोसे का कर्ज आज भी है । श्यामा टॉकीज के पास लेकर वाली चाय भी कभी कभी पसंद की जाती रही जो हमें स्वाद भले ही उतना न दे पाती मगर मधुर पलों का अहसास जरूर दिया करती थी ।मेडिकल कॉलेज की कैंटीन में डॉक्टर बंधु (अक्की बाबू) के साथ चाय पर चर्चा और रास्ते में झा जी के ढाबे पर चाय और पनीर पकोड़े पर बहस का नशा अफीम के नसे से कम न था । हर चाय की दुकान पर साथ राजीव बाबा का होता ही था। हफला - मरंगी से लेकर काकी की दूकान , बस चाय और राजीव बाबा का अंतहीन साथ । चाय की बात हो और डॉक्टर बाबू विवेक की बात न हो तो चाय का किस्सा अधूरा होगा । पहली बार कोई दोस्त मिला था जो खुद चाय बनाकर कर पिलाता । छोटी गैस स्टोव और चाय का सॉसपैन बस यही उसकी दुनिया होती ।  घंटों खौलती गहरी दूध वाली वो असाधारण चाय और उसके बीच का गहन वार्तालाप । प्यार पर गंभीर चर्चा और चाय की चुस्की का वो दौर मानो वक़्त थम सा जाता ।  चाय तो बस एक जरिया था । असली स्वाद दोस्तों के साथ का था । चाय रोमांस है । चाय की चुस्की विचार है । इस चाय ने सबको न जाने कितने अनमोल रिश्तों का तोहफ़ा दिया है । चाय बस एक चुस्की भर नहीं बल्कि सामाजिक जुड़ाव की एक मजबूत कड़ी थी जिसने हम सबको साम्यता के बंधन से जोड़ा था जहां बस प्रेम का माधुर्य रस हुआ करता था जिसकी मिठास जेहन में आज भी ताज़ी है ।
☕☕☕
(राजू दत्ता ✍🏻)

[उन सभी मित्रों और चायवाले बड़े भाइयों और उनके परिवार वालों को समर्पित जिसने अपने प्रेम से हमें सदा अनुग्रहित किया है । बहुत सारे मित्रों और लोगों के नाम उद्धतरित नहीं किए जा सके परन्तु हर किसी ने प्रेम के माधुर्य रस से हमें सींचा है । हर एक व्यक्ति मेरी अंतरात्मा से जुड़ा है । उन सबको मेरा नमन है ।🙏🏻🙏🏻🙏🏻]
© राजू दत्ता

Wednesday, 20 May 2020

गांव हूं मैं

हां गांव हूं मैं 
धूप में शीतल छांव हूं मैं
धूल और मिट्टी ही पहचान मेरी 
व्याकुलता में ममता की छांव हूं मैं
हां, वही गांव हूं मैं ।

मौन था मैं
जब लगा था लांक्षण 
असभ्य , जाहिल और गवार हूं मैं 
गए थे छोड़कर , सिसका था मैं
हां, वही गांव हूं मैं।

जोहता रहा था बाट मैं
तेरे जाने के बाद मैं
न तू आता ,न तेरी खबर 
शहर के आगे बेअसर था मैं
हां, वही गांव हूं मैं।

सिक्कों से खाया चोट था मैं
पूछी न किसी ने सुध मेरी 
अपनों के बीच अनजान हूं मैं
वात्सल्यता ही पहचान मेरी 
हां, वही गांव हूं मैं।

देखकर छाले पांव के
सिसका हूं बारम्बार मैं
लुटाउंगा ममता की फिर वही छांव मैं
कोई मुझे रंजिश नहीं
हां, वही गांव हूं मैं ।

सींचा था सारा शहर
अपने ही रक्त से 
क्यूं जुदा हुए दो जून से 
धूल मिट्टी से सजी, भाली गवार हूं मैं
हां, वही गांव हूं मैं।

प्रकृति की वरदान हूं मैं
समझ न पाए मुझको तुम
न भूखों सोने देता तुझको मैं
हां, वही वरदान हूं मैं
हां, वही गांव हूं मैं।

आओ लौट, जोहता अब भी बाट मैं
वेदना मिटाने का कारगर उपाय हूं मैं
प्रकृति से जीना सिखाने का पर्याय हूं मैं
हां, वही ममता की छांव हूं मैं
हां, वही गांव हूं मैं।

*(राजू दत्ता)*✍🏻

Tuesday, 19 May 2020

अंतर्मन

नेत्र मात्र का खुलना ही दिख जाना नहीं 
अंतर्मन के चक्षु ही सत्य बतलाते हैं ।

अधरों का हंसना मात्र ही आनंद नहीं 
अंतर्मन की गहराई ही सत्य बतलाते हैं ।

मिले जो हाथ मात्र वो साथ नहीं
अंतर्मन का मिलना ही सत्य बतलाते हैं ।

देकर अन्न मात्र ही मिटाना भूख नहीं 
अंतर्मन की करुणा ही सत्य बतलाते हैं ।

मंदिर मस्जिद जाना मात्र ही भक्ति नहीं 
अंतर्मन की शुद्धि ही सत्य बतलाते हैं ।

नेत्र मात्र का खुलना ही दिख जाना नहीं 
अंतर्मन के चक्षु ही सत्य बतलाते हैं ।

(राजू दत्ता) ✍🏻

Friday, 15 May 2020

चवन्नी की कॉमिक्स

उन दिनों टेलीविज़न और दूरदर्शन का लुफ्त उठाना सबके लिए सहज नहीं होता था और इसी बात की कमी को हमारी एक दूसरी दुनिया पूरा कर दिया करती थी और वह थी हमारी अपनी - "कॉमिक्स और बाल पत्रिकाओं की दुनिया"

अक्सर मुझे वो दिन याद आ जाते हैं जब शाम ढलते ही सीधा सीताराम लाइब्रेरी जाया करता था और गोवर्धन भैया ४-५ कॉमिक्स की गड्डियां मेरे सामने रख देते थे । उनमें से मैं जिनको पढ़ चुका होता अलग रख देता और मेरे हिसाब से जिन कॉमिक्स के टाइटल नए और मेरे पसंदीदा चरित्रों वाले होते उन्हें चवन्नी प्रतिदिन किराए के हिसाब से पढ़ने के लिए घर ले आता था । ऐसे तो दो चार और भी लाइब्रेरी थी शहर में मगर जो बात गोवर्धन भैया की सीताराम लाइब्रेरी में थी वो किसी और में नहीं थी । एक तो घर के नजदीक और बिल्कुल हमारे स्कूल "बाल विद्यापीठ " के करीब और ऊपर से गोवर्धन भैया और उनके सभी परिवार वालों का शालीनता पूर्ण व्यव्हार । वह केवल लाइब्रेरी नहीं बल्कि हमारे लिए एक वटवृक्ष की तरह था जिसकी छाव में हमारे बचपन की कौतूहलता पली - बढ़ी । वह केवल कॉमिक्स और चवन्नी का रिश्ता भर नहीं था बल्कि कुछ और ही था जिनकी जड़ें आज भी  उन यादों का पोषण करती हैं । लाइब्रेरी के सामने शो केस में "इन्द्र की हार" वाली डाइजेस्ट की तस्वीर आज भी ताज़ी है । डाइजेस्ट का भाड़ा कॉमिक्स से ज्यादा था तो कभी कभी मिला करता था । पहली कॉमिक्स जो भाड़े पर ली थी आज भी याद है -"जासूस टोपिचंद और पेट्रोल की खेती"। उस समय कॉमिक्स पढ़ना भी एक चुनौतपूर्ण कार्य था जिसे हम अपनी पाठ्य पुस्तकों में छिपा कर पढ़ा करते थे ।

उस समय मेरे चहेते कॉमिक्स चरित्र ही हमारे सुपरहीरो हुआ करते थे. 

‘वो मारा पापड़ वाले को’ बांकेलाल का यह मशहूर और पसंदीदा डायलॉग मुझे, मेरे भाई बहनों और दोस्तों को गुदगुदाता था और हम कहानी के अंत तक यही चाहते थे कि बांकेलाल एक बार और बोले ’वो मारा पापड़ वाले को’। बांकेलाल की किस्मत और उनको मिला श्राप भला कौन भूल सकता है । यह रोमांच शायद आज भी इसलिए बरकरार है क्योंकि वो कानों में इयरफोन लगाकर सुनी जाने वाली फूहड़ कॉमेडी नहीं थी, साबू का ज्यूपिटर ग्रह से आना और धरती पर बस जाना मेरे लिए एक ऐसा रोमांच था जैसे कि मैं स्वंय साबू के ग्रह पर घूम आया हूं.. बिल्लू के बाल जो हमेशा उसकी आंखो के छज्जे को ढंके रहते थे मैं यही सोचता था कि आखिर इसको दिखता कैसे होगा.. शायद यही सुनहरा बचपन था और मैं भी यही कहने की कोशिश कर रहा हूं कि तकनीक ने इस नस्ल से बचपन के इस रोमांच को दूर कर दिया है.. चाचा चौधरी, साबू, नागराज, ध्रुव, डोगा, तौसी, भोकाल, अंगारा, आक्रोश, क्रुक बॉन्ड, परमाणु, बांकेलाल, पिंकी, रमन, और बिल्लू के दीवाने अपने चहेते कॉमिक्स चरित्रों को पढ़ने के लिए अपने दोस्तों के साथ कॉमिक्स की अदला बदली कर पैसों की बचत भी कर लिया करते थे । एक नहीं, दो नहीं ढेर सारी कॉमिक्स पूरे महीने के लिए संजो कर रखना शौक हुआ करता था, लेकिन दौर बदला और कॉमिक्स चरित्रों से नए बच्चों का मन ऊब गया जमाना डिजीटल था बच्चों ने भी कॉमिक्स से बेहतर विकल्प आज कल के स्मार्ट फोन्स को चुना तकनीक के सहारे इतने आगे निकले कि अपने चहेते कॉमिक्स चरित्रों को तो अब याद भी नहीं करते यूं कहें तो साबू की लंबाई का रोमांच इन स्मार्ट फोन्स ने खत्म कर दिया।

यह तो सभी जानते थे कि "चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है" लेकिन कंप्यूटर से भी तेज़ दिमाग वाले आदमी को मिनी कंप्यूटर के आगे भूल गए.. उस जमाने में कॉमिक्स बच्चों के लिए मनोरंजन साधन के साथ-साथ प्रेरणादायक कहानियों का एक जखीरा था.. लेकिन अफसोस आज इन कॉमिक्स चरित्रों में किसी को दिलचस्पी नहीं है.. जिन कॉमिक्स और कई बाल पत्रिकाओं ने सालों तक बच्चों के दिलों पर राज किया उनका तकनीक के आगे कुचला जाना बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है.. तकनीक ने भले ही इस नस्ल को एक छोटे से डिब्बे में ब्रह्मांड दे दिया हो लेकिन जो बाल साहित्य कभी बच्चों की जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंश हुआ करते थे आज तकनीक के आगे दम तोड़ते नज़र आ आते हैं.. इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं कि तकनीक का त्याग कर दें लेकिन अपने उस अंश को जिसे हम भूल चुके हैं एक बार फिर अपनी इस पीढ़ी को याद दिलाना चाहिए ।

आज का बचपन बदल चुका है और  बाल पत्रिकाओं और कॉमिक्स अपनी उम्र की ढलती कगार पर है । सवाल यह है कि उस दौर में बच्चों को कॉमिक्स चरित्र इतने अज़ीज़ क्यों थे क्यों आज वो बाल पत्रिकाओं की जगह महंगे मोबाइल फोन मांगते हैं । बेशक बीते सालों में काफी कुछ बदला चुका है, डिजिटल क्रांति ने शिक्षा के क्षेत्र में भी हर उम्र के छात्रों के लिए नए अवसर दिए तकनीक के विकास से बच्चों के मन और मस्तिष्क दोनों का विकास भी हुआ लेकिन इस सब के आगे बचपन छीना जाना बेमानी होगा । चंदामामा, चंपक , नंदन , गुड़िया , नन्हें सम्राट , बाल भारती न जाने कितनी किताबों ने हमारे बचपन को सींचा है । इन बाल पत्रिकाओं ने न केवल हमारे बाल्यमन में साहित्य रुचि का बीजारोपण ही क्या अपितु एक मधुर रिश्ता भी लाइब्रेरी वाले भैया और पेपर वाले भैया से स्थापित भी किया जो आज भी जीवंत है । उन बाल पत्रिकाओं और कॉमिक्स ने एक असाधारण सामाजिक ताना - बाना रच डाला था जिसमें आज भी हमारे रिश्ते जुड़े हैं । वो एक मजबूत सामाजिक कड़ी थी। आज फिर एक मजबूत सामाजिक कड़ी स्थापित करने और आज के बचपन को डिजिटल इंद्रजाल से निदान हेतु वैसे ही "सीताराम लाइब्रेरी " और वैसे ही गोवर्धन भैया की आश्यकता है ।
*(राजू दत्ता)*✍🏻

Tuesday, 12 May 2020

हाफ पैंट

दो चार बार दर्जी मास्टर के यहां जाकर पता करने की कोशिश करने की कवायद कि वो पुरानी अब न इस्तेमाल होने वाली परिवार के बड़े सदस्यों की फूल पैंट से दो नई हाफ पैंट (निक्कर) सिलकर तैयार हुई या नहीं तो निराशा ही हाथ लगती थी । उस समय ये इल्म न था कि दर्जी मास्टर के लिए यह कोई प्राथमिकता का काम न था । नए कामों पर ज्यादा दाम मिलने का उत्साह हमारे बाल मन के कौतूहल से ज्यादा था और तो और हमारे काम के लिए दाम भी एकमुश्त मिलने के कम आसार और किस्तों में मिलने के आसार उनके काम को सुस्तता से भरने के लिए काफ़ी होते थे । कई बार दर्जी की फटकार सुनने के बाद बस एक ही उपाय शेष बचता था कि बस किसी भी बहाने से दर्जी की दुकान के सामने से बार बार गुजरा जाए और अपनी तिरछी नज़रों से पुरानी पैंट से बने नए निक्कर को तलाशा जाए । दर्जी के लिए यह काम भले ही दोयम दर्जे का था मगर हमारे लिए बिल्कुल नए से नए अनुभव का पल होता था । बेतरतीब तरीके से चिप्पियों वाले हाफ पैंट के सामने पुराने फूल पैंट से बना नया हाफ पैंट हमारे लिए एक नूतन गौरव का कारण था । एक पुराने फूल पैंट से दो हाफ पैंट को तैयार करवाने की जद्दोजहद और किसी तरह टेलर मास्टर का तैयार होना एक बहुत बड़ी बात होती थी । आखिर ढली उम्र वाली जर्जर फूल पैंट से दो हाफ पैंट को तैयार करना काफी बारीकियों भरा काम भी तो होता था और ऊपर से सिलाई के उतने दाम भी न मिलने और मिलने भी तो किस्तों में । आखिर किसी तरह वो दिन आ ही जाता जब दो हाफ पैंट घर आ जाता जिनमें काफ़ी अंतर भी हुआ करता था ।साइज के अंतर पर तो ध्यान भी न दिया जाता । किसी एक में जिप होती तो किसी एक में बटन । किसी में दो पॉकेट होते तो किसी में एक भी नहीं । ऐसे भी उन दिनों पॉकेट का इस्तेमाल बस जाड़े में हाथ डालकर रखने में होता था न कि सिक्कों को सहेजने में । हमारे लिए वो दिन उत्सव का ही होता था । पुरानी फूल पैंट से नए हाफ पैंट के उत्सव का दिन ।
(राजू दत्ता)✍🏻