Friday, 8 May 2020
सजीव का आनंद
लपटों का संघर्ष
Sunday, 26 April 2020
अंतर्मन की व्यथा
Saturday, 25 April 2020
बरगद का पेड़
Saturday, 19 October 2019
अजीब दिन थे
अजीब दिन थे
बिन मंजिल की तलाश में वो दौड़ने के दिन
बेवज़ह हंसने के वो दिन
अंतहीन बातों के वो दिन ।
खुली धूप में बेफिक्री के वो दिन
वो देर रात तक यारों संग बकबक के अंतहीन दिन
कंधे मिलाकर पटरियों पे बेवज़ह चलने के दिन
अभाव के किसी भावों के न होने के दिन ।
अंतहीन , दिशाहीन सरकते वो दिन
बेपरवाह मचलते झूमते वो दिन
बिन पैसे के सबकुछ ख़रीद लेने के दिन
सरसराती हवाओं में छुपे गीत को ढूंढने के वो दिन ।
बादलों में छुपी तस्वीरों को उकेरने के वो दिन
बारिश की बूंदों पर थिरकने के वो शानदार दिन
बिन साज-ओ -सामान के वो सजने के दिन
रातों को खुले आसमान में तारे गिनने के वो दिन ।
अबोध मन के उन्मुक्त तर्कहीन वो दिन
फूलों को खिलते दिखने के वो दिन
पंछियों के कलरव को बेवजह गुनगुनाने के दिन
अजीब दिन थे , वो न बीतने वाले दिन ।
(✍🏻राजू दत्ता )
Thursday, 18 July 2019
शहर के सिक्के
आया था शहर गांव छोड़कर
कमाऊंगा चंद सिक्के ये सोचकर
आया था गलियां वो छोड़कर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
बोली थी बूढ़ी माँ ना जा छोड़कर
ना माना आया सरहद वो छोड़कर
मिलेगा सहारा घर को ये सोचकर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
था उनको ये दिलासा कि आऊंगा लौटकर
जोड़े थे चंद सिक्के बड़े सहेजकर
हसरतें होंगी पूरी बच्चों की ये सोचकर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
जाना था कल ये शहर छोड़कर
सिक्कों की थैली बड़े सहेजकर
खुशियों की तम्मना यूं समेटकर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
मारी जो जोर टक्कर यूं रपेटकर
ख़ून की थी धारा बिखरी थी सड़क पर
बिखरे थे सारे सिक्के खन-खनाकर रोड पर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
भीड़ भी थी काफ़ी यूं घेरकर
दया की थी नजरें इस गरीब पर
शामिल भी थे कुछ सिक्कों की लूट पर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
बुझ रही थी सांसे घर यादकर
बढ़ा ना कोई साथी क्या सोचकर
छंट रही थी भीड़ भी हमें छोड़कर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
ना देखा किसी ने नब्ज भी टटोलकर
जा रहा था बहुत दूर मैं शहर को छोड़कर
मिट रहा था मैं माँ की आस तोड़कर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
(राजू दत्ता )
Sunday, 14 April 2019
सतुआ परब
आज 'सत्तुआनी' है ! इस् पर्व को पंजाब में 'वैशाखी' भी कहते हैं - वैशाख महीने का पर्व ! गाँव में होते थे - एक दिन पहले ही 'घोन्सार' से तरह तरह का 'सत्तू' भूंजा और पीस कर आता था - चना का सत्तू , जौ का , मकई का ...मालूम नहीं कितने तरह का ...फिर "आम के टिकोला" का चटनी ! 'भंसा घर' ( किचेन ) के दुआरी ( दरवाजा ) पर् बडका पीढा ( लकड़ी का बैठने वाला ) पर् बाबा नहा धो कर बैठ जाते थे - सफ़ेद चक चक खादी वाला धोती ..वहीँ उनके सामने छोटे वाले पीढा पर् हम भी बैठ जाते ..फिर परदादी एक बड़े थाली में तरह तरह का सत्तू परोसती थीं ...और तब तक 'आम के टिकोला' को पुदीना के साथ मिला कर बड़े वाले सिलवट पर् 'चटनी' पिसा रहा होता ...जल्दी लाओ ..'चटनी' :))
जब तक बाबा और हम खाते रहते ..परदादी उतने देर तक पंखा लेकर बैठी होंती थी ...उधर किसी को आने का इज़ाज़त नहीं होता !
एक सुबह से ' पीतमपुरा ' में "टिकोला" खोज रहा हूँ ..नहीं मिला ✍🏻