Saturday, 25 April 2020
बरगद का पेड़
Saturday, 19 October 2019
अजीब दिन थे
अजीब दिन थे
बिन मंजिल की तलाश में वो दौड़ने के दिन
बेवज़ह हंसने के वो दिन
अंतहीन बातों के वो दिन ।
खुली धूप में बेफिक्री के वो दिन
वो देर रात तक यारों संग बकबक के अंतहीन दिन
कंधे मिलाकर पटरियों पे बेवज़ह चलने के दिन
अभाव के किसी भावों के न होने के दिन ।
अंतहीन , दिशाहीन सरकते वो दिन
बेपरवाह मचलते झूमते वो दिन
बिन पैसे के सबकुछ ख़रीद लेने के दिन
सरसराती हवाओं में छुपे गीत को ढूंढने के वो दिन ।
बादलों में छुपी तस्वीरों को उकेरने के वो दिन
बारिश की बूंदों पर थिरकने के वो शानदार दिन
बिन साज-ओ -सामान के वो सजने के दिन
रातों को खुले आसमान में तारे गिनने के वो दिन ।
अबोध मन के उन्मुक्त तर्कहीन वो दिन
फूलों को खिलते दिखने के वो दिन
पंछियों के कलरव को बेवजह गुनगुनाने के दिन
अजीब दिन थे , वो न बीतने वाले दिन ।
(✍🏻राजू दत्ता )
Thursday, 18 July 2019
शहर के सिक्के
आया था शहर गांव छोड़कर
कमाऊंगा चंद सिक्के ये सोचकर
आया था गलियां वो छोड़कर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
बोली थी बूढ़ी माँ ना जा छोड़कर
ना माना आया सरहद वो छोड़कर
मिलेगा सहारा घर को ये सोचकर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
था उनको ये दिलासा कि आऊंगा लौटकर
जोड़े थे चंद सिक्के बड़े सहेजकर
हसरतें होंगी पूरी बच्चों की ये सोचकर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
जाना था कल ये शहर छोड़कर
सिक्कों की थैली बड़े सहेजकर
खुशियों की तम्मना यूं समेटकर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
मारी जो जोर टक्कर यूं रपेटकर
ख़ून की थी धारा बिखरी थी सड़क पर
बिखरे थे सारे सिक्के खन-खनाकर रोड पर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
भीड़ भी थी काफ़ी यूं घेरकर
दया की थी नजरें इस गरीब पर
शामिल भी थे कुछ सिक्कों की लूट पर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
बुझ रही थी सांसे घर यादकर
बढ़ा ना कोई साथी क्या सोचकर
छंट रही थी भीड़ भी हमें छोड़कर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
ना देखा किसी ने नब्ज भी टटोलकर
जा रहा था बहुत दूर मैं शहर को छोड़कर
मिट रहा था मैं माँ की आस तोड़कर
होंगे ख़्वाब पूरे ये सोचकर
आया था शहर गांव छोड़कर
(राजू दत्ता )
Sunday, 14 April 2019
सतुआ परब
आज 'सत्तुआनी' है ! इस् पर्व को पंजाब में 'वैशाखी' भी कहते हैं - वैशाख महीने का पर्व ! गाँव में होते थे - एक दिन पहले ही 'घोन्सार' से तरह तरह का 'सत्तू' भूंजा और पीस कर आता था - चना का सत्तू , जौ का , मकई का ...मालूम नहीं कितने तरह का ...फिर "आम के टिकोला" का चटनी ! 'भंसा घर' ( किचेन ) के दुआरी ( दरवाजा ) पर् बडका पीढा ( लकड़ी का बैठने वाला ) पर् बाबा नहा धो कर बैठ जाते थे - सफ़ेद चक चक खादी वाला धोती ..वहीँ उनके सामने छोटे वाले पीढा पर् हम भी बैठ जाते ..फिर परदादी एक बड़े थाली में तरह तरह का सत्तू परोसती थीं ...और तब तक 'आम के टिकोला' को पुदीना के साथ मिला कर बड़े वाले सिलवट पर् 'चटनी' पिसा रहा होता ...जल्दी लाओ ..'चटनी' :))
जब तक बाबा और हम खाते रहते ..परदादी उतने देर तक पंखा लेकर बैठी होंती थी ...उधर किसी को आने का इज़ाज़त नहीं होता !
एक सुबह से ' पीतमपुरा ' में "टिकोला" खोज रहा हूँ ..नहीं मिला ✍🏻
Sunday, 10 February 2019
वसंत पंचमी
बसंत पंचमी का नाम सुनते ही वो दिन बरबस ही आँखों के सामने तैरने लगते हैं . टीन के डब्बे में बंद चंद सिक्के की खन - खन की आवाज़ बजाते चंदा काटने का वो सुकून भरा पल आँखों को नम कर देता है . दिन भर का वो दौर और शाम को पैसे गिनने का कौतूहल वो पल कोई कैसे भूल सकता है ? चंदे में दूधवाले से दूध फल वाले से फल जो भी मिल जाता था वसूले जाते थे . वो तड़के की सुबह सवेरे शहीद चौक पर गाय -भैंस वालों को रोककर चंदे की बकझक और फ़िर चंदा वसूल लेने के विजयभाव का वो गर्व अब भी गर्वित करता है . बांस लगाकर , रास्तों को रोककर सायकल वाले , रिक्शे वाले , स्कूटर वाले से चंदा काटना अपने आप में एक त्यौहार सा था . अबकी बार कौन सा क्लब कौन सा पंडाल सजायेगा , मूर्ति कहाँ से आएगी इसका पता लगाना एक अद्भुत अनुभव सा था . रायगंज से मूर्ति लाने का गौरव किसी -किसी को था . दिनभर मिशन रोड , अनाथालय रोड और न्यूं मार्केट का चक्कर लगाना और बनती मूर्ति को अनंत बार बैठकर देखते रहना और मुर्तीवाले से डांट फ़टकार खाकर भागना और छुपकर फ़िर देखना वो कौतूहल कौन भूल सका है ? माँ की सारियॉँ से पंडाल बनाना और सारी फटने पर डांट और पिटायी का वो मंज़र अभी तक ताज़ा है .ख़ुद से पंडाल सजने की वो अनमोल काला अब खोती सी जा रही है .पूजा की रात रातभर जगना और चाय -पावरोटी का मज़ा लेने का वो सौभाग्य हमें मिला हुआ था . मूर्ति विसर्जन के बाद खिचड़ी बांटने और खाने का वो स्वर्गिक आनंद अद्भुत था . क्लब के मेंबर होने का सुख ये था कि प्रसाद और खिचड़ी ज़्यादा मिलता था जो कि किसी उच्च ओहदे से कम न था . वो नाच -गाना , वो संगीत , वो आनंदित पल भुलाए नहीं भूले . वो चट्टान क्लब अब नहीं रहा मगर जेहन में वो मधुर यादें चट्टान सी खड़ी हैं .(RD)✍🏻✍🏻✍🏻
Wednesday, 5 September 2018
शिक्षक
उन दिनों शिक्षक दिवस पर 20 पैसे की टिकट स्कूल में लेना होता था . हरे रंग के स्टाम्प साइज़ पर काले रंग क़ा राधाकृष्णन जी की पोट्रेट बनी होती थी . कमीज पर पिन से उसे लगाना और हो गया शिक्षक दिवस पूरा. छुट्टी नहीं हुआ करती थी . ताम झाम नहीं था मगर शिक्षकों के प्रति जो सामाजिक आदर सत्कार और श्रध्दा भाव था वह शिक्षक दिवस की परकाष्ठा से परे था . छात्र पर जो गुरु क़ा अधिकार था वो परिवार से भी बढ़कर था . गुरु को अपने शिष्य पर पूर्ण अधिकार था . गुरुजी के दंडविधान पर कोई सामाजिक प्रतिबंध न था बल्कि शिक्षा क़ा यह पर्याय था . बावज़ूद इसके गुरु क़ा स्थान प्रथम श्रेणी में था. गुरु के लिए अर्थ से ज़्यादा इस बात क़ा अर्थ था कि शिष्य की शिक्षा विशेषकर नैतिक शिक्षा किस दिशा में जा रही है . सम्पूर्ण समर्पण क़ा भाव जो गुरु क़ा था वो नालायक से नालायक छात्र को पथ पर लाने को पर्याप्त था . आज़ समय के साथ बदलते सामाजिक प्रारूप ने शिक्षा की दिशा को बदल डाला है . पहले शिक्षा क़ा उद्देश्य नैतिक था अब आर्थिक है और गुरु क़ा अर्थ भी अब अर्थ तक सिमट चुका है . वो सामाजिक ताना बाना अब जर्जर हो चुका है . अर्थ ने गुरु शिष्य के आत्मीय संबंधों क़ा अर्थ बदल दिया है . अब उस हरे रंग की टिकट की जगह क़ीमती केकों और महँगे पेन ने ले लिया है . अब शिक्षक दिवस पर स्टेज सजते हैं और काफ़ी धूम धाम होती है . मगर एक शिक्षक और छात्र के बीच की दूरियां बढ़ती जा रही है . दूर कोने पर एक शिक्षक उपेक्षित है और छात्र गुरुछाया से वंचित है . पहले एक मानव निर्मित होता था और आज़ सिर्फ सिलेबस पूरा होता है . मैं गौरवान्वित हूँ कि मैं उस युग क़ा शिष्य हूँ जहाँ गुरु क़ा स्वरूप गोविन्द से भी परे रहा .
उन सभी गुरुओं को मेरा आत्मिक नमन है जिन्होंने बिना मूल्य के अमूल्य बीजो क़ा बीजारोपण मुझमें किया अन्यथा हम जैसे अर्थविहीन की शिक्षा एक दिवास्वप्न होती .
(बाल विद्यापीठ, मारवाड़ी पाठशाला , D.S.College एवं Genious Coaching तथा उन सभी गुरुओं को मेरा सहृदय नमन है🙏🏻🙏🏻🙏🏻 ) (RD✍🏻✍🏻✍🏻)
Sunday, 2 September 2018
वो मेला
*मेले की उस जगह पे खड़े नजरें उन दुकानों क़ो ढूंढ रही हैं जहां सजा करती थी मिट्टी की वो मूरतें , वो गर्दन हिलाता दाढ़ी वाला बुढ्ढा , शिवलिंग पे लिपटा हिलने वाला सांप , वो गेहूं पीसने वाला जाता , वो गहरे गुलाबी और जलेबी रंगों वाले पुतले जो बजा करते थे , वो पट पट कर पानी में चलने वाली टीन की नांव , वो मिट्टी की पुतला -पुतली किधर है ? कहाँ गया वो हल्की गुलाबी लालिमा लिए कुछ पीलापन लिए अधपके आलुओं की चाट सजाये वो दुकान वाला ? वो खटास और महक कहाँ छोड़ आया वो ? वो कागज़ की घिरनी बेचनेवाला शायद बीमार होगा जो नहीं आया . वो खींचकर जादू से लंबी -लंबी मीठी लड़ियों से मुर्गे , घिरनी और पंखे बनानेवाला किधर छिपा बैठा है ? वो हवा मिठाई वाले की साइकिल किधर है जो पैडल मरते ही घौउ -घौउ की बेचैन कर देने वाली आवाज़ किया करता था ? वो बाइस्कोप पर दिल्ली क़ा कुतुबमीनार दिखाने वाला अबकी क्यों नहीं आया ? वो बाजे -बांसुरी क़ा शोर जो मेले की आवाज़ हुआ करती थी , क्यूँ नहीं सुनायी दे रहा ? वो लोहे क़ा झूला जो झूलेवाला दो पैसे में चाहे जितना चक्कर लगवा लो चिल्लाया करता , वो अब खाली क्यूँ पड़ा है ? वो मिट्टी की टूमनी बेचनेवाला जिनके पास ना जाने कितने तरह की टूमनियाँ हुआ करती थी वो उस दुकान पे क्यूँ खड़ा है जहां पीग्गी बैंक सजे हैं ? वो शामियाने क़ा रंग-ओ -रूप भी क्यूँ बदला -बदला सा है ? वो मेला जो सजता था एक एक पल के इंतजार में , आज़ इतना सूना क्यूँ दिख रहा ? मन इसी ख्यालों के अंतर्द्वंद में उलझा सा था कि मोबाइल की घंटी बज उठी और आवाज़ आयी -"कहाँ हैं ? डिजनीलैंड कब जाना है ? "(RD)✍🏻✍🏻✍🏻*