Thursday, 8 December 2022

बेरोजगारी का समाजवाद

*#बेरोजगारी का समाजवाद और गरम समोसा...!#*

सच है न ! बेरोजगारी की रईसी रोज़गार की शोहरत से ज्यादा मज़े दिया करती थी । वो भी क्या दिन हुआ करते थे जब पॉकेट खाली और दिल खुशियों से लबालब भरे हुआ करते थे । वो चाय की दुकान और वहां होनेवाली किच - किच के मजे कि पैसे कौन देगा? चाय के तू देगा और बिस्कुट के वो ! कल मैंने पिलाया था , आज तू देगा ! नाश्ते की दुकान हो या फिर समोसे की दुकान और या फिर मूंगफली वाले का ठेला हो , पैसे का किच - किच ही असली स्वाद दिया करता ! नया सिनेमा और पहले शो का पहला टिकट बुक होने से पहले का जुगाड़ और गहन माथापच्ची का क्लाइमैक्स आज की वेबसरीज के क्लाइमैक्स से भी ज्यादा क्लाइमैक्स दिया करता ! और यही उम्दा क्लाइमैक्स बेरोजगारी की दर्द को दबाए रखा करता ! बिना बुक्स मेंटेन किए पूरा और सही हिसाब - किताब हुआ करता और बैलेंस शीट पूरी तरह बैलेंस हुआ करता ! जो कुछ भी चिल्लर अपनी जेब में हुआ करता उसका १०० प्रतिशत अपने पर खर्च हुआ करता और उन दोस्तों की उधारी पर जिससे ऐश किए जाते ! ज्यादा अमीर दोस्त गरीब दोस्तों के खर्चे उठाया करता और कम अमीर अपना जुगाड़ खुद कर लेता । देश में समाजवाद भले ही फेल हुआ हो मगर बेरोजगारी का समाजवाद हमेशा सफ़ल रहा है । बेरोजगारी में कोई अमीर और कोई गरीब नहीं होता । सब एकसमन बेरोजगार होते हैं और इसका मज़ा सब बराबर - बराबर लेते हैं ! इसी मजे के नशे में मार्क्सवाद भी पनपा होगा !

 खैर..! फिर रोज़गार की घातक बीमारी फैली और वो शानदार नशा टूटा और फिर आदमी भी टूटा! अब पैसे जेब में आने लगे और वो दोस्तों की किच - किच ख़त्म होने लगी ! सारे रोजगारी हो गए ! बेरोजगारी का समाजवाद ध्वस्त हो गया । अब वो १०० प्रतिशत जो बेरोजगारी में अपने पर खर्च हुआ करता बाकि जिम्मेदारियों पर लुटा जाता है और बेरोजगारी का चिल्लर भी अब हाथ से गया ! आदमी पहले से ज्यादा कंगाल हो गया । अब बैलेंस शीट गड़बड़ा गया और लायब्लिटीज ज्यादा हो गया । हर कोई अपना बैलेंस शीट ठीक करने की जुगाड़ में व्यस्त होकर दोस्तों से किच - किच और हुल्लरबाजी भूलता गया और वो असली स्वाद जाता रहा ...! अब आदमी सिनेमा का उतना मजा नहीं ले पाता और खुद सिनेमा हो चुका है ।

जिंदगी का असली स्वाद दोस्तों की किच - किच और थोड़े अभाव में ही होता है । अपना समोसा जल्दी - जल्दी खाकर दोस्तों के समोसे को झट से उठाकर खा जाने का आनंद उस अपने हिस्से के समोसे के स्वाद से ज्यादा आनंदपूर्ण होता है । चाय के पैसे की किच - किच और आज तू पिलाएगा वाली फीलिंग ही गुड फीलिंग है और बाकी तो बस गहरी फीलिंग ही है ! किच - किच का जो संगीत है वही असली सुर है बाकि तो बस दिल को बहलाने का कोई भी ख्याल अच्छा है । पूरा रोजगार जिंदगी के संगीत को बेसुरा कर दिया करता है । थोड़ी बेरोजगारी जरूरी है जिंदगी में ताकि आप फुरसत में अपनों के साथ किच - किच कर जिंदगी में क्लाइमैक्स बनाए रख सकें और जिंदगी के नूरानी मज़े ले सकें ! 

*(राजू दत्ता✍🏻)*

Monday, 12 September 2022

घुघनी - मूढ़ी

#घुगनी -मूढ़ी#

लिट्टी - चोखा के बाद अगर हमारे बिहार में कोई दूसरी नंबर वन जोड़ी है तो वो है घुघनी - मूढ़ी की जोड़ी और साथ में चने की दाल वाली कचड़ी और आलू चॉप रहे तो सुभान - अल्ला 😋

शाम का समय हो और मध्यम सी हल्की - हल्की बारिश की फुहार  और चावल का भूंजा या फिर मूढ़ी और ऊपर से घुघनी और कढ़ाई पर खौलते तेल में तैरता कचड़ी,चॉप और फिर गरमा - गरम बैंगनी ...!😍 उसी गरम तेल को छनौटे से लेकर भूंजे में डालकर जो तड़का तैयार किया जाता उसे परवान चढ़ाता प्याज और हरी मिर्च का तीखापन और कचड़ी, चॉप और बैंगनी का संगम ....!😍

बस याद आते ही वही नायब स्वाद जिंदगी का फिर जिंदा हो उठता है ...! 🥰 छोटे शहर की बड़ी दास्तां अक्सर बड़े शहर की छोटी सी कहानी पर हावी हो ही जाती है ....😊

विशुद्ध देशी और मन को मोह लेनेवाला आईटम...! हर जेब में फिट और हमेशा सुपरहिट..! एकदम जिंदा आईटम...! प्रोटीन से लेकर विटामिन सी और तमाम मिनरल्स और सरसों तेल का हल्का फैट ! 🤩 शाम का ऐसा नाश्ता जिसका कोई जोड़ - तोड़ आजतक नहीं आया ...! पिज्जा - बर्गर, मोमो- टोमो और पास्ता -मैगी को धूल चटाता मूढ़ी - घुघनीं आज भी शानदार , जबरदस्त, जिंदाबाद से लबरेज़ आईटम नंबर १ ही है ...!😋

मिट्टी की भांड में सोंधी - सोंधी खुशबू लिए गरम चाय साथ में और फिर दिलखुश घुघनी - मूढ़ी का दिलकश आईटम और बारिश की फुहार और दोस्तों के साथ गुफ्तगू हो तो आप जन्नत में हैं...! बस आपके पास भींगे - भींगे से जज़्बात हों और चंद यार साथ हों और आप दूर कहीं छप्पर वाली दूकान पर उबलती चाय की केतली को तिरछी नजरों से देखते हुए भूंजा फांक रहे हों तो कसम से आप एक जिंदगी के बेहतरीन पलों में से एक बेहतरीन पल को जी रहे हैं ...!🥰 बाकी तो बस जज़्बातों का खेल है और गूंगे का गुड़ है ....!😇

हम तो इस जीवन रस का नायाब स्वाद लेते रहे हैं और आज भी नुक्कड़ की दूकान पर मिट्टी के चूल्हे की आंच में उबलती चाय और खौलते तेल में अपने भींगते जज़्बात की गर्म भांप को महसूस किया करते हैं ...!🥰

(राजू दत्ता✍🏻)

Wednesday, 31 August 2022

ढोलक साबुन से मिलेनियम तक

*ढोलक साबुन से मिलेनियम तक*

कटिहार से हैं और अगर ढोलक साबुन का नाम नहीं सुना तो याद ताजा किए देता हूं 😇 जी हां , ढोलक साबुन! ऐसा साबुन जो सबकुछ धो देने की काबिलियत रखता । सोडा की खटास भरी गंध लिए ढोलक साबुन की मिठास भरी यादें अब भी कटिहार और आसपास के क्षेत्रों के लोगों में ताज़ी हैं । ग्रोवर साहब की जी सोप फैक्ट्री में ढोलक साबुन तैयार होकर पूरे जिले को नहला - धुलाकर तैयार किया करता । उन दिनों शैंपू केवल मधुबाला जैसन मुंबईया हीरोइन ही इस्तेमाल किया करती थी । आम आदमी ढोलक साबुन जैसा साबुन ही माथा में घस घस के अपना गंदा और लट्ठा वाला बाल धोकर फुरफुरा करके हीरो वाला फीलिंग करता था । कपड़ा भी ढोलक ही धो दिया करता । आम आदमी जिसका कोई भी कभी भी बजा देता , चार आने का ढोलक साबुन खरीदकर अपना कच्छा बनियान से लेकर सबकुछ धो डालता था । बाकी सब साबुन अमीर और हीरो टाइप आदमी के लिए बना था । लाइफबॉय से नहाकर आदमी एकदम से तंदुरुस्त हो जाता बिना कोनो दवा के ।

इस छोटे से जीवन में तरह तरह का साबुन देखा और लगाया लेकिन आज भी गर्मी के दिनों में खस और जाड़ा में पियर्स का कोनो जोड़ - तोड़ नहीं है । 

भैया लोगन को लक्स लगाते देखते थे । दे लक्स ...दे लक्स । ढेला जैसा लेकिन सुगंधित । किसी पर चला दीजिए तो कपार फुट जाए । माधुरी दीक्षित भी लक्स से ही नहाते - नहाते हेरोइन हो गई थी । 

मम्मी का पसंदीदा होता था - मार्गो - नीम वाला । हम लगाते तो मुंह तक तित्ता हो जाता । जब हम लोग टीन एजर हुए तो - जिसका टीवी प्रचार बढ़िया - उहे साबुन खरीदाएगा । 

लिरिल 😝 आज भी लिरिल के प्रचार का कोई बराबरी नहीं कर पाया । ला... लाला ... ला.... 😶‍🌫नींबू की खुशबू के साथ - लिरिल से नहा लीजिए तो तन से लेकर मन तक फ्रेश फ्रेश 😊 नहाते वक़्त उसका प्रचार भी याद कर लीजिए 😝 मन कुछ और भी फ्रेश । 

फिर सिंथॉल आया - घोड़ा लेकर विनोद खन्ना अंकल ऐसा दौड़े की सिंथॉल भी बाज़ार में दौड़ने लगा - लेकिन हम कभी नहीं लगाए , ई वाला साबुन बड़का लोगन का होता था । 😐 पिता जी उम्र के विनोद खन्ना नहीं पसंद आए 😐 

एक आता था - मोती साबुन । वो और भी ढेला । तराजू के बटखरा जैसा । चंदन की खुशबू पहली बार मोती में ही सुंघे । फिर दक्षिण भारत से मैसूर चंदन वाला - सरकारी साबुन । ऐसा लगता था कि नहाने के बाद अब सीधे पूजा ही करना है - चंदन का असर होता था । कभी कभार खरीद कर थोक में घर भी लाते । अलग अलग क्वालिटी । एक्सपोर्ट क्वालिटी खरीदते वक्त एनआरआई टाइप फिल होता था 😁

लाइफबॉय का नसीब देखिए 🙃 उसका जिंदगी टॉयलेट के पास ही कट गया । कटा हुआ लाइफबॉय । जब किसी के शरीर में चमड़े का कोई बीमारी होता था तो बाबू उसको सलाह देते थे कि लाइफबॉय लगाव । हम उनका मुंह देखते थे - कोई कैसे शरीर में लाइफबॉय लगा सकता है 😐 लेकिन बैक्टीरिया मारने का सबसे बेजोड़ साबुन लाइफबॉय ही होता था ।😷 

उसी टीनएज दिनों में  डिंपल आंटी गोदरेज के किसी साबुन के प्रचार में आई । कुछ ग्लोरी टाइप । ऐसा ना जुल्फ झटकी की दो चार महीना वो भी खारीदाया । कोई दोस्त महिम बोल दिया - लेडिस साबुन है । डिंपल आंटी का प्रचार मन में रह गया और साबुन दूर हो गया ।🤦🏻‍♀️ 

पार्क एवेन्यू भी दूध के स्मेल टाइप कुछ प्रोडक्ट लाया लेकिन हम नहीं लगाए । बेकार । पूरा शरीर दुधाईन महकता था ।🙄

फिर कुछ ओव डोब आया - जनानी टाइप । लगा के नहाने के बाद , कितना भी तौलिया से देह पोंछिए - लगता था अभी भी साबुन देह में लगा ही हुआ है 😶‍🌫 

फिर , भारत का सबसे महंगा साबुन - मिलेनियम । ₹ 850 प्रति केक । 12 % चंदन का तेल । लगा लीजिए तो ऐसे ही खुद को मैसूर महाराजा समझने लगिएगा । अखोर बखोर से बात करने का मन नहीं करेगा 😝 

अभी हम डेटॉल साबुन से नहाय रहते हैं और डेटोल वाला गंध से गमगमाये रहते हैं । कोरोना में डेटॉल वाला जादा काम करता है ऐसा प्रचार वाला बार बार कहता है ।🤧😷

इधर रामदेव बाबा भी जड़ी बूटी वाला साबुन बेच रहे औरो योगा वाला आदमी सब वही साबुन से नहा रहा आजकल 😊

अभी लिख रहे हैं कि जोर का डांट पड़ा है कि छुट्टियों में चैन नहीं आपको .....😖

हद हाल है ...अब जन्मकुंडली के केंद्र में शुक्र बहुत मजबूती से बैठे हैं तो मेरा क्या दोष 😐 अब यही सब पसंद आएगा - साबुन तेल पाउडर गीत ग़ज़ल इतिहास भूगोल इत्यादि इत्यादि 😝

एक मेन चीज का चर्चा छूट गया – बॉडी वाश । आजकल बोतल औरो पाउच में साबुन का लिक्विड आने लगा है । एक बार कोनो बढ़िया होटल में मंगनी में मिला सो घस घस के नहाए । आह...। बेहतरीन मर्दानगी वाली खुश्बू के साथ । लेडिस वाला अलग से लिखा था । हर जगह के लिए अलग अलग लिक्विड रखे था , अलग अलग खुशबू लिए  😇

अब तो कोनो मर्दाना वाला पार्क एवेन्यू टाइप घासिए और ओल्ड स्पाइस आफ्टर शेव । मस्त होके गॉगल्स लगाइए और बुलेट हांक दीजिए – शर्ट का ऊपर वाला दो बटन खोल 😎 बीच बीच में गोविंदा वाला दांत निकलते हुए रजनीकांत स्टाइल में लहरियाते हुए ।

🥰 चाहे कितनों साबुन लगा लीजिए , ढोलक का मुकाबला कोनो नहीं .... काहे कि कटिहार का अपना साबुन है 😎

*(राजू दत्ता✍️ रंजन ऋतुराज भैया के आशीर्वाद से )*

Tuesday, 30 August 2022

ठेलागाड़ी

#ठेलागाड़ी#

९० के दशक तक जन्मे ऐसे कौन लोग होंगे जो लकड़ी की इस मर्सिडीज को नहीं जानते और इसका इस्तेमाल जिसने न किया हो 🥰 तीन पहिए वाले लकड़ी के इस ठेलागाड़ी ने हम सबको खड़े होकर चलना सिखाया है 🚶‍♂️घरवाले हमें इसके सहारे खड़े कर लगभग दौड़ा ही दिया करते और गिरते संभलते हम धीरे धीरे पक्के हो जाया करते 🥴 हर मेले और हर हाट में लकड़ी की यह ठेलागड़ी मिलती ही मिलती ☺️ बिना ब्रेक की इस गाड़ी ने हमें तेज चलते और दौड़ते हुए बिना ब्रेक के भी यह बखूबी सिखा दिया कि संभलना कैसे है और रुकना कब और कैसे है 😇 उठते - गिरते और संभलते और फिर दौड़ लगाते और साथ देती यह ठेलागाड़ी....🕺🏻इसी की सवारी करते हम कदमों को सही ताल देना सीख पाए और संतुलन का तरीका भी जान पाए 🕴️इस तीन पहिए की गाड़ी ने अपनी क्षमता से कहीं बढ़कर हमें सहारा दिया है 🧑‍🦯 

समय बदला और अचानक से यह गाड़ी गायब हो गईं और नए - नए रिक्शे और वॉकर आते गए और बच्चे डाइपर में वॉकर में पैर फंसाए चलना सीखने लगे । वॉकर में कोई रिस्क नहीं । बस दोनों तरफ टांगें फंसा दो और बच्चा खड़े - खड़े लुढ़कता जाता है और ऐसा करते करते बिना घुटना छिलाए चलना सीख जाता है । अब बिना घाव हुए ही  बच्चे चलना और दौड़ना सीख जा रहे हैं । संतुलन बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी मॉम - डैड का ही है । पहले की तरह खुद ठोकर खाते हुए संभलने का रिस्क नहीं रहा 😇 बिना ब्रेक के कब कैसे ब्रेक लगाना है और कैसे संतुलन बनाना है यह अब उतना अहम नहीं रहा ....😌 अपने समय में मां - पिताजी को ख़बर नहीं हुआ करती कि किस घुटने में किधर चोट के निशान हैं और हम कितनी बार गिरे । आज मॉम - डैड को दिन - रात की फिकर रहती है कि बेबी गिर न जाए । गिरने और संभालने की परिभाषा शायद बदलती सी जा रही है ...! नए खिलौने ने पुराने को बदलकर सबकुछ बदल दिया है और बदलाव जारी है ....😇 

चाहे जो भी हो अपनी पुरानी मर्सिडीज का कोई जोड़ - तोड़ नहीं ....🥰 तीन पहियों के साथ हमारे दोनों पैरों को दिशा देता और गिरकर संभलना सिखाता अपना तिपहिया सबपर भारी है...!

(राजू दत्ता✍🏻)

Saturday, 27 August 2022

ताड़ के पंखे का तार

#ताड़ के पंखे का तार#

जेठ की तपती दोपहरी और पसीने से तर बतर पूरा शरीर...! हवा का कोई नामो निशान नहीं ...! पत्ते भी खामोश !

पीढ़िया पर आलथी - पालथी मारे हम खाना खा रहे होते और मां पानी से भींगे ताड़ के पंखे से खुद पसीने से नहाए हमें हवा करती और हम राजा बाबू की तरह शीतल हवा में मस्त ! ये दौर था हमारी राजशाही का ...! 

उन दिनों बिजली का पंखा बहुत ऊंची चीज़ हुआ करती ...! बड़े लोग सीलिंग फैन लगाते और मध्यम लोग टेबल फैन और कम मध्यम लोग अपनी हैसियत के हिसाब से छोटा लोकल टेबल फैन...! बाकियों के लिए घूमने वाले रंगीन बांस के पंखे और ताड़ के पत्तों के पंखे । ताड़ के पंखों के चारों ओर करीने से पुरानी साड़ियों के कपड़े सीकर सजाए जाते ...! बड़ी शीतल हवा ताड़ के पंखों से आती और पानी से भिंगोकर पंखा झलने से कूलर जैसी ठंडी और पानी की फुहार वाली हवा आती और पूरे बदन को शीतल कर जाती ....! 

गर्मियों में दादी , नानी, मासी , काकी और मां सबके हाथों में अमूमन ताड़ के पंखे होते ...! सोते हुए भी पंखे झलने का नायब हुनर हमने अपनी मां में देखा है ...कई बार पंखे हाथ से छूट जाते और फिर नींद में ही पंखे फिर से झलने लगते ...! कभी कभी बाज़ार में बांस या प्लास्टिक के जापानी पंखे भी मिल जाते मगर ताड़ के पंखे की जगह नहीं ले पाए...! बिलकुल किफायती और ठंडी हवा का जरिया ...।

टेबल फैन की बात करें तो घूमने वाला टेबल फैन चारों तरफ़ हवा फेंका करता और आदमी बार - बार इंतज़ार में रहता कि कब पंखे का मुंह उसकी ओर आए...। चलती टेबल फैन के सामने चेहरा किए आवाज निकालने पर जो कटी - कटी सी फटी आवाज़ अर्र..... अर्र ... सी आती वो हमारे लिए नया संगीत हुआ करता और घूम - फिरकर अर्र..... अर्र ...की आवाज निकालते हुए मुग्ध होता बचपन ...!

उषा, सन्नी, बजाज और भी न जाने कितने ब्रांड मगर शादियों में लगने वाले तूफ़ान का धारदार पत्ती वाले फैन के तूफानी हवा के सामने सब फेल था । तेज स्पीड में दूर तक हवा फेंकने का अजूबा हुनर मानों सबकुछ उड़ा ले जायेगा .... तूफ़ान फैन में भी हमने अर्र..... अर्र ...कर अपने बुलंद हौसले को आजमाया हुआ था । बारातियों के बारात घर में यही तूफ़ान लगाया जाता और शादियां हुआ करती ....! लाईट कटने पर जनरेटर से तूफ़ान चला करता ।

सीलिंग फैन बड़ी चीज थी । गर्मियों में सीलिंग फैन का घर में होना जबरदस्त इज्ज़त की बात हुआ करती ...! बस स्विच दो , रेगुलेटर में स्पीड सेट करो और औंधे लेट जाओ बेखबर और देखते रहो घूमता हुआ पंखा ...! गर्मियों की रात लाइट गई और फिर चार आने की प्रसाद चढ़ाने की कबूलती और फिर लाइट आते ही खुशी से चिल्लाते हुए वापस घर और पंखा चालू....! पूरा माहौल सजा होता और जिंदगी पंखे की स्पीड से हवा छोड़ती उड़ती जाती ....! कभी गर्म तो कभी ठंडी हवा के झोंको से चलती जिंदगी ...!

ताड़ के पंखे धीरे - धीरे कम होने लगे ....बढ़ती हैसियत के साथ टेबल फैन और सीलिंग फैन का चलन बढ़ा और आदमी बिना हाथ के पंखे से हवा लेता आगे बढ़ता गया ....!

फिर कूलर बाबा आए और ठंडी हवा का नया झोंका लेकर आए और आदमी और ठंडा हुआ । तार और बांस का पंखा हाथ से मानों छूट ही गया ...! राजा बाबू अब कूलर के सामने डाइनिंग टेबल पर खाने लगा । मां को अब आराम हो गया ।

रेल की यात्रा और गरमी का मौसम और उल्टा लटका टेबल फैन बिना कलम घुसाए भला खुद चल जाए? चल गया तो चक्कर नहीं तो स्टेशन पर फिर वही हाथ वाला पंखा या फिर २ रुपए का प्लास्टिक का लिखो फेको वाला पंखा ।

फिर कूलर बाबा को नीचा दिखाने एसी साहब आए और गरमी में जाड़े की सरदी दे गए ...जेठ की दोपहरी तो वही मगर चादर ओढ़े एसी के कमरे में ....! आदमी अमीर होता गया और गरमी बढ़ती गई और फिर ठंडक का जुगाड बढ़ता गया ....! विंडो जिससे पड़ोसी के घर दिखा करते वहां विंडो एसी का कब्ज़ा हो गया । स्प्लीट एसी ने तो ऐसी गदर मचाई कि पूरे का पूरा घर बंद होकर ठंडा हो गया ...। जेठ की दोपहरी वाली गरमी अब ताड़ के पंखों का मोहताज नहीं रही । रिमोट कंट्रोल से मौसम उंगलियों का गुलाम हो गई और ताड़ का वो गीला पंखा और दोपहर के खाने के साथ मां की हवा खाने का दौर बदल सा गया ...! पंखा झलते मां हर बात और हर कहानी कहती जाती और राजा बेटा तपती दोपहरी में शीतल हवा में मुग्ध होकर गर्म खाना खाता !

मां की शीतल छांव में गुजरी जेठ की दोपहरी में जो ठंडक हुआ करती आज की सेंट्रलाइज्ड एसी में भी वो ठंडक कहां! लकड़ी की पीढ़ी पर आलथी - पालथी मारे बैठकर दोपहर का भोजन और करीब बैठकर मां का ताड़ का पंखा झलना ...स्वर्ग का सुख भी इसके आगे कुछ भी नहीं ...! ताड़ का पंखे का तार कहां तक जुड़ा हुआ करता यह तो वही जाने जिसने इसकी शीतलता का आनंद अपनी मां की ममता की छांव में लिया है ...! न जाने कितने ही ग्रीष्म काल बीते एसी के बंद कमरों में मगर वो ठंडक कभी महसूस नहीं होती ....मगर हां , उन यादों के साए में फिर वही ठंडक आज भी तो आती है ....आती है न?

#(राजू दत्ता✍🏻)#

Monday, 25 July 2022

बीघा से स्क्वायर फूट तक

#बीघा से स्क्वायर फुट तक#

दिल्ली एनसीआर, नोएडा , गुरुग्राम , मुंबई .....ये वो नाम हैं जहां हर कोई गुमनाम है ...🧙🏻‍♂️ गांव से निकले काफ़िले यहीं आकर रुकते हैं ....!🏃🏻‍♂️ 
कुछ को नौकरी चाहिए तो कुछ को रोज़गार और कुछ को चकाचौंध ...!💫 

बीघों की जमीन छोड़ स्क्वायर फीट में जिंदगी को फिट कर लेने की धुआंधार दौड़ में शामिल भीड़ और सोचता हुआ " मैं" .....!😇

समाज को कोसों दूर छोड़ता हुआ सोसायटी ढूंढता एक नया समाज!🕵🏻‍♂️ स्विमिंग पूल , क्लब , जिम और भी न जाने कौन - कौन सी अमेनिटीज ....और फिर स्क्वायर फीट में सिमटी २ , ३ और ४ बीएचके चमकते टाईल्स वाले फ्लैट्स ....और उसकी बालकनी से झांकती सुकुन ढूँढती हजारों आंखें और सोचता मन ....!🤔

92.7 एफएम पर बजता गाना - " दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात - दिन ...." और फिर उदास मन और फिर " एक अकेला इस शहर में , रात या दोपहर में ......" फिर चलते हैं कहीं दूर खुली वादियों में पहाड़ों की ओर तो फिर कहीं खुले आसमान के नीचे खुले समुंदर की ओर  .....!🌊
 बैचेन मन और फिर बीघे में बिखरी यादें और स्क्वायर फीट में सिमटी दास्तां.....!🫥 स्क्वायर फीट में लगी पूरी जमा पूंजी और फिर किश्तों में बटी जिंदगी और समझौतों में उलझी - उलझी बिना आसमां वाली रातें ....!🌑 सूखते और बिकते बीघे और स्क्वायर फीट के भरते किश्तों का सफ़र और बेहिसाब असर और फिर कटती उमर....!🕗

फिर एफएम पर " रात के बारह बजे दिन निकलता है ... सुबह के छः बजे रात होती है .... आमची मुंबई...  " फिर सब कुछ उल्टा - पुल्टा...!🙃 

रात - दिन और फिर दिन और रात सब बराबर और जमींजोद होती जिंदगी ....! यार ! निकल चलते हैं इस जंजाल से और चलते हैं उसी पुराने चौपाल पे और बीघों में फैले उस पुराने मकान में ...मगर , किंतु, परंतु, बट.....! 😇बहुत कन्फ्यूजन है ....!😇 

सांप - छुछुंदर के इस खेल में जिंदगी ऐसे ही बीतती जाती है और फिर ऑफिस , काम , किश्त, एफएम और ऐसी ही कशमकश में कश लगाता धुआं छोड़ता हर फिक्र को धुएं में उड़ाता धुआं - धुआं होता आदमी .....!🌪️ और फिर सुबह होती है , शाम होती है और जिंदगी यूं ही तमाम होती है ...! 👨🏻‍🦯

यात्रीगण कृपया ध्यान दें - " गाड़ी संख्या १२४२३ नई दिल्ली से गाजियाबाद , कानपुर के रास्ते इलाहाबाद , मुगलसराय, पटना होते हुए ....कटिहार .....प्लेटफार्म नंबर १६ पर आ रही है ....यात्रीगण अपने समान की रक्षा स्वयं करें ....भारतीय रेल आपकी सुखद और मंगलमय यात्रा की कामना करता है ....धन्यवाद!🚑

(राजू दत्ता✍🏻)

Saturday, 23 July 2022

टायर - ट्यूब से यूट्यूब तक

#टायर - ट्यूब से यूट्यूब तक#

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यूट्यूब वाले बच्चों !🫵🏻📢 

बचपन में हम भी बहुत टायर और ट्यूब चलाया करते थे....!🚨 मगर फासला बहुत है अब और तब में....!⏳ 
हम यूट्यूब भी चला लेते हैं मगर आज के इंटरनेटी बच्चे टायर और ट्यूब नहीं चला सकते...!😤

खाली पैर या फिर चप्पल के खुलते हुए फीते को अपनी पैर की उंगलियों से ही दुबारा भीतर ठेलते हुए दौड़ लगाते दनादन टायर चलाने का कौशल कूट - कूट कर भरा था....!🥳 

साइकिल की बेकार चिप्पी लगी टायर और ट्यूब हम पूरे दिन हांकते रहते और फ़िर उसी टायर और ट्यूब को एक दूसरे से फंसाकर झूला भी बनाकर झूमते रहते .....🧚‍♀️

टायरों को खुले हाथों या फिर छोटे डंडे से  मार मारकर हम भगाया करते और फिर रेस लगाते....!🚴🏼‍♂️ और फिर मर चुके टायर को जलाकर 🔥आग सेकने के बाद उसके भीतर के तार को जमा कर कबाड़ वाले को बेचकर कभी लाल वाली आइसक्रीम तो कभी लेमनचूस या फिर काला पाचक खरीद लेते....🥓🍡🍬 ऐसा जबरदस्त हुनर था हमारे पास ...😇 हम अपना जुगाड़ ख़ुद कर लेते ...! 

अब कौए के घोंसले में छापा मारकर उनके मजबूत चोंच और लोल से मार खाते और बचते - बचाते लोहा लक्कड़ निकलकर जब्त करके कबाड़ वाले से वैल्यूएशन करवा के सही दाम में बेच लेना और पैसे लेकर ऐश करना आज के इंटरनेट युग से कहीं ज्यादा हुनरमंदी का काम था ...!😇

 खैर ...! रात गई और बात गई ...और हम आ गए ट्यूबलेस युग में और पुराने टायर और ट्यूब हो गए ख़त्म..! अब बंद कमरों में यूट्यूब तेजी से चल रहे हैं ....और बच्चे साफ - सुथरे होकर चका - चक हो चुके हैं .....!🕵🏻‍♂️ अब स्केटिंग पर बच्चे फिसल रहे हैं और पेप्सी और कोक के साथ पिज्जा - बर्गर खाकर अपना पेट गड़बड़ कर रहे हैं ...🤮 

अब सोर्सेज और रिसोर्सेज बदल चुके हैं और ज़माना सरकते हुए कहीं दूर निकल चुका है ....!🏃🏻‍♂️

अब हमलोग तो उसी पुराने खेत के पुराने और पके हुए कनकजीरा टाइप महकते चावल हैं जिसकी गमगमाहट कभी ख़त्म नहीं होती ...!🥰🥰🥰

©(राजू दत्ता ✍🏻)

Friday, 22 July 2022

परसेंटेज का खेल

#परसेंटेज का खेल#

सोशल मिडिया से लेकर आकाश - पाताल तक बधाइयों का तांता लगा हुआ है ....🥳💐फलाना का लड़का निन्यानवे प्रतिशत लाकर सब कुछ रोशन कर गया ....💥⚡  निन्यानवें प्वाइंट निन्याने लाकर ज़िला हिला दिया ...💫  बहुत हर्ष और गर्व की बात है और जश्न भी बनता है 🎂 ...! 

अब जरा सोचें - पहले रिजल्ट में लोग पास या फ़ैल पूछते थे, 
फिर विकसित विचारधारा ने डिवीजन पूछना शुरू किया
और आजकल परसेंट पूछ कर असली औकात का आंकलन किया जाता है !! फिर एडमिशन का दौड़ शुरू होता है और फिर परसेंटेज की आग में सबकुछ धुआं - धुआं होकर राख होता महसूस होता है जब परसेंटेज के हिसाब से सब गुड़ - गोबर हो जाता है ...😣

मगर उन बच्चों का क्या जो निनानवे से चूक गए और सत्तर - पछत्तर पर ठहर गए? 🤔 क्या उनकी जिंदगी भी ठहर गई? 🤔 क्या उसने पूरे जहां में अंधेरा फैला दिया? 🤔 क्या उनके माता - पिता मातम मनाएं? 🤐 अरे भाई! परसेंटेज ही जिंदगी है क्या? परफॉर्मेंस की बात है! कभी ठीक तो कभी मोटा - मोटी! होगा न फिर से शानदार, जबरदस्त और जिंदाबाद! जश्न हर किसी का बनता है जब जिंदगी की नई पाली आरंभ होती है ....🥳 ये परसेंटेज का खतरनाक खेल महज आभासी है! असली जिंदगी में परसेंटेज से ज्यादा जमीनी सफलता मायने रखती है और सफ़लता का मैदान और क्षेत्र हर किसी का अलग - अलग होता है ...! हर कोई अपने - अपने मैदान में सचिन तेंदुलकर होता है ....! 

 किसी की योग्यता महज परसेंटेज पर आंकना ठीक नहीं ...जिंदगी की दौड़ में आगा - पीछा होता ही है और फिर जिंदगी के और भी इम्तेहान बाकी होते हैं? कभी - कभी सचिन तेंदुलकर भी जीरो पर आउट हो गए तो क्या? 🤔 

जिंदगी रूकती नहीं ...आगे असीम संसार है जहां मंजिलें इंतजार में है बस एक पल रुककर गहरी सांस लेकर लंबी छलांग लगाने की दरकार है ...! 🫵🏻

जिसकी परफॉर्मेंस ठीक नहीं रही उसका हौसला - आफजाई करें ...👍🏻 पैरेंट्स को भी और स्टूडेंट्स को भी ....!👍🏻 परसेंटेज के प्रचार से ज्यादा अहम साथ मिलकर चलना है 👯🏻‍♂️ क्या पता आज का बैक बेंचर कल आपके सामने अपने पुराने संघर्ष और अनुभव के बल पर एक आदर्श बनकर खड़ा हो जाए ...! 👨🏻‍🎨 और यह होता रहता है और जिंदगी अपने कई रंग में रंगती रहती है । आज सादा तो कल रंगीन ....🌈

हर छात्र उभरता हुआ सितारा है ...! जश्न जरूरी है , परसेंटेज तो महज एक संख्या है ...! मोटिवेट करें 🫵🏻 और आज की शाम का मोटिवेशन ही कल के उगते सूरज का उज्जवल प्रकाश है ....🌞

Dedicated to all students and their parents! 🙏🏻 

©(राजू दत्ता ✍🏻)

Sunday, 17 July 2022

मुड़े हुए नोट

*मुड़े हुए नोट*

यह छोटी सी तस्वीर सब कुछ बयां कर देती है । कुछ भी कहने की जरूरत नहीं रह जाती ....🙇🏻‍♂️ जीवन - सुख के  सम्पूर्ण सार को अपने में समेटे यह तस्वीर लाज़वाब है ...😍  आज हमारी जिंदगी  पैकेज में बंधी - बंधी सिमटी - सिमटी सी है । जीवन - सुख की परिभाषा बदल सी गई है ।  खैर  ! जिंदगी यूं ही बदलती रहती है और उनके मायने भी साथ - साथ बदलते जाते हैं 🙆🏻‍♂️ सफ़लता की बुलंदियों से नीचे झांकती जिंदगी बस एक धुंधली सी तस्वीर का अहसास ही करती है .... जिंदगी दूर तलक खोई - खोई सी बड़ी सी पैकेज में ऊंची बिल्डिंगों में समाई उन पुराने जज़्बातों से तन्हाई में गुफ्तगू करती है और हम उन अनमोल लम्हों के दीदार अपने अंतर्मन में कर जिंदगी को धुआं - धुआं होते दीदार करते हैं ....🧐

 खैर ....! आगे बढ़ते हैं ....🚶🏻‍♂️ इस तस्वीर की उस बेशकीमती स्पर्श को हम महसूस करने से भला खुद को कैसे रोकें ...!🫳🏻 यह तस्वीर हमारी उस जिंदा जिंदगी की एक धरोहर है जहां हमने अपने बेशकीमती लम्हें दर्ज किए हैं ....🕕

उन जर्जर हो चुके हाथों से हमारे बचपन ने जो बेशकीमती खजाने पाए हैं वो बेहिसाब हैं । त्यौहारों का जश्न हो या फिर मेहमानों की विदाई, उन बुजुर्ग हाथों ने चुपके से अपनी आंचल के कोर से बंधी जो विरासत हमें सौंपी है वह पूरी धरती के तमाम जवाहरातों से भी कीमती थे! वो चवन्नी, वो अठन्नी, वो करीने से मुड़े हुए नए नोट .....!🌝 दशहरा, दिवाली , होली  या फिर ईद और बकरीद या फिर बैसाखी.....हमारी जिंदगी इसी मुड़े नोट से सीधी और बेहिसाब खुशी भरी हुआ करती! नानी , दादी, काकी, नाना, दादा और काका सब के सब हमारे जिंदा बैंक हुआ करते और हम उन बैंकों के इकलौते मालिक! क्या सल्तनत थी हमारी .....ननिहाल से लेकर ददिहाल तक फैली सल्तनत और हम रहते भी तो थे फैले - फैले से .....!💂‍♀️💂‍♀️💂‍♀️ 

खनाजों का हिसाब हम रात और दिन लगाया करते! बार - बार सिक्कों की गिनती और गिनती के वक्त चवन्नियों की खनखनाहट के अलौकिक संगीत से हम सरोबार रहते । उन जमा खजानों से हम सब कुछ खरीद लेने का जज़्बा रखते .....🥰

कभी बाईस्कोप वाले के पीछे दौड़ते - भागते १० पैसे में दिल्ली का कुतुबमीनार देख आते तो कभी लाल - पीली आइसक्रीम खाकर अपने जीभ रंगते हुए सबको दिखाते फिरते । काग़ज़ की घिरनी , फन फैलाए सांप, आर्मी वाली जीप और टैंक, राजा की कोठी और रानी की सेज सब के सब हमारी हैसियत के भीतर ही तो थे ....🫶🏻

आसमां से जमीं और फिर जमीं से आसमां सबकुछ ख़रीद चुके थे । हमारे पास उन झुरझुरे हाथों की ताक़त हुआ करती और हम उसी ताकत के बलबूते राजा हुआ करते....🕵🏻‍♂️ 

अब क्या कहें? कोई बराबरी नहीं । जीवन भर की कमाई एक तरफ़ और वो चुपके से थमाए गए मुड़े हुए नोट एक तरफ़ .....! असली सल्तनत वही तो थी जिसके सुलतान हम ही तो थे ....! कसम से इतने सुंदर हाथ जिनसे हमारे बचपन को करीने से संवारा और सहेजा , हमने अभी तक नहीं देखे ....और शायद कहीं दूर तलक नहीं दीदार होने वाले ...! वो मुड़े हुए नोट अब ख़त्म हो चुके हैं और हमारा बेहिसाब खज़ाना अब ख़ाली हो चुका है और लाखों की पैकेज लेकर हम तन्हां - तन्हां जिंदगी का साथ निभाते चले जा रहे हैं ...!🤝


(राजू दत्ता✍🏻)

Tuesday, 12 July 2022

पुरानी कहानी

📔पुरानी कहानी📔

बात उतनी भी पुरानी नहीं! कहानी उस दौर की है जब हर हर घर के आंगन में आम , जामुन, अमरूद, कटहल , नारियल और भी कई तरह के फलदार पेड़ लगे हुआ करते थे जिनके पके और अधपके फलों से भरी डालियां बरामदे से बाहर भी झूमा करते थे ।🌳 हमारे झुंड बिना व्हाट्स के हुआ करते और हर कोई एडमिन हुआ करता!👨‍🚒

हम अक्सर जामुन, आम आदि फल चुराकर और खुद से तोड़कर खाया करते थे । कभी आंगन की तंग दीवारों पर चुपके से चढ़कर तो कभी झुकी डालियों में करीने से लटकते हुए पेड़ के ऊपर । आंगन के बाड़े के छेदों में पैर फंसाए हम लटकते फलों तक पहुंचने का नायाब हुनर रखा करते । फल चाहे पका हो या अधपका और या फिर कच्चा, हम इंतजार में यकीं नहीं करते थे! बस तोड़ लेने का जानदार जज़्बा हुआ करता! नाजुक बदन पर चाहे कितने ही खरोचें आ जाए मगर निशाना चूके नहीं चूका करता ।🤺 हमारी गुटों की रणनीति बेजोड़ हुआ करती । एक साथी तो बस उस खड़ूस बुढ़िया के आने पर ही टूक नज़र रखा करता जिसके आंगन में पके शरीफों से लदे पेड़ हुआ करते ।🍑 बेर के कांटों से भरे डाल हमारे जज़्बातों के आगे कुछ भी नहीं हुआ करते ।🍒 अधपके बेर से हमारे पॉकेट भरे रहा करते । काले नमक और पिसे हुए लाल मिर्च की पुड़िया हमेशा हमारे पॉकेट में हुआ करती और हम बेर और इमली के साथ उन्हें मिलाकर पुराने खंडहर में बड़े शान से राजशाही अंदाज में खाया करते ।🥑 परोस की काकी के घर के कच्चे अमरूद जो कभी पूरे पक न सके इसका श्राप हमें रोज लच्छेदार भाषा में मिला करता और हम बस आंखें बंद किए कसीले अमरूदों में भी पुख्ता स्वाद ढूंढ लिया करते । फल तो फल , हम तो फूलों तक को ब्रह्मबेला से पहले ही तोड़कर उनकी जन्मजात खुशबुओं से रूबरू हो जाया करते।🌺 पूजा के फूल तड़के सवेरे हम चुरा कर पहले ही पूजा कर लिया करते।🪷 बिना उगाए और सींचे ही हम पूरी बगिया के सुल्तान हुआ करते । जहां तक हमारी पहुंच नहीं होती , हमारी गुलेल पहुंच जाती । निशाना अचूक हुआ करता । उन दिनों ओलंपिक ज्यादा मशहूर नहीं था और गुलेल को शामिल भी नहीं किया गया था नहीं तो गोल्ड 🏅 पक्का था । गुलेल भी हम चुराई हुई अमरूद की टहनी और चमरे और रिक्शे के सीट के रबर से ही बनाया करते । पूरा फ़्री का शो हुआ करता वो भी हर वक्त । बंसी लेकर घंटों तालाब के किनारे बैठकर बेर खाते हुए मछली पकड़ना और फिर सेठजी के आते ही दौड़ते गिरते भाग खड़ा होना और फिर मुर्गियों के ताजे नरम अंडे उठाकर छिपा देना । ये सब हमारे कंपल्सरी आउटडोर एक्टिविटी हुआ करते । इंडोर का स्कोप चूंकि था ही नहीं तो हम आउटडोर में ही व्यस्त होकर रहा करते । मार - पीट , कुटाई , डांट - डपट , पेड़ पर उल्टा लटका देने जैसे दंड हमारे लिए बहुत छोटी और तुच्छ सी चीज़ हुआ करती जिसकी अच्छी खासी प्रैक्टिस हमने कर रखी थी । हमारे लिए हमारे मिशन का टारगेट ज्यादा अहम था न कि कुटाई । "मिशन एकंप्लिशड" ही हमारा एकमात्र ध्येय हुआ करता और मरते दम तक उसे पूरा करते फिर चाहे कितनी ही रातें क्यों न काली करनी होती । वो जुनून, वो जोशो - खरोस , वो जज़्बा हमारे अंदर लबालब भरा हुआ करता । ये पुरानी कहानी थी हमारी उस जिंदगानी की! 


युग बदला और फिर झुंड बदला  फिर हमें ख्याल आया कि हमें तो विकसित होना है ! पश्चिम की भांति सजावटी दिखावटी बनना है। बस फिर क्या था फलदार पेड़ों को जगह ले ली सजावटी पेड़ पौधों ने और डंडे, पत्थर से फल तोड़ने और पेड़ पर मित्र की मदद से चढ़ने की कला का स्थान ले लिया, मोबाइल ने और सेल्फी स्टिक ने । बचपन जिसको मिट्टी में लोटना था, कीचड़ में खिलना था और नदियों में तैरना था  वो रील, टिकटोक, फेसबुक, इंस्टाग्राम, पब जी, 4 जी में घुस गया।
बस होना क्या था..सब कहानी खत्म, हो गया, टाटा, बाय बाय! 🫠

अब नेटफ्लिक्स और अमेजन पर वेब सीरीज देख बच्चे कौतुहलता को महसूस किया करते हैं और असली रोमांच जो पुरानी जिंदगी में थी उसको बस परदे पर देख उसकी चुभन महसूस करते हैं । जिंदगी बदल गई है अब । आहते पर अब आम और अमरुद नहीं और वो झुंड भी नहीं! खड़ूस बुढ़िया की लच्छेदार गालियों का संगीत अब कहां? सेठजी के तालाब अब सूख चुके हैं और बचपन का वो रस भी अब सूखकर रसातल में चला गया है। वो सौंदर्य और संगीत अब स्टूडियो तक ही सीमित रह गया है । बचपन अब बेजान चीजों में जान ढूंढती नज़र आती है! वो जिंदगी जो हम जी चुके जिसने हमें जिंदगी का हर फलसफा समझाया और जिसने हर चीज से जुड़ने का सबक सिखाया और जिसने संघर्ष का पाठ पढ़ाया अब दिखता नहीं । बगीचे उजाड़ दिए गए और फिर चॉइस बदल दी गई और फिर सबकुछ बदल गया! ☺️ 

(राजू दत्ता ✍🏻)

Friday, 24 June 2022

कजरौटा काजल का

#कजरौटा काजल का#
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बात उन दिनों की है जब हम बिना जॉनसन शैंपू और पाउडर के जॉनसन बेबी से भी ज्यादा स्मार्ट दिखा करते थे! यकीं नहीं होता न? एक बार गौर और इत्मीनान से ठंडे दिमाग के साथ  फ़ोटो को देख डालिए तो सबकुछ साफ़ दिख जायेगा ....!👼🏻

आजकल सुपरफास्ट 5जी का जमाना है । पैदा होने से पहले ही घर पर जॉनसन का पैक तैयार मिलता है और छट्टी में तो 10 में से 8 शगुन तो जॉनसन का ही रहता है । शैंपू, तेल , चिरोनी और लंगोट से लेकर पोछना तक ...सब ब्रांडेड और अंगरेज वाला । 

जॉनसन काल से पहले तो पैदा होते ही घुट्टी पिलाकर कड़वा तेल से जबरदस्त मालिश किया जाता और मालिश के दरम्यान सरसो तेल के दीए के ऊपर कजरौटा लगाकर देशी काजल से आंखों पर सूरमा कुछ ऐसे ही लगाया जाता था । आंखों पर परपराकर लगने वाला जलन अभी भी काजल देखते ही महसूस हो जाता है । एक बार काजल घसने के बाद धीरे - धीरे पूरे का पूरा काजल फैलकर पूरे चेहरे को अपनी आगोश में लेकर एक नायाब और बेहद खूबसूरत चेहरे का रूप हमें दिया करता । गले और बाह में काला धागा और काजल का जलवा हमें अप्रतिम सौंदर्य से ओत प्रोत कर दिया करता । कसम से इतना स्मार्ट तो अंगरेज का आज का बच्चा भी नहीं दिखता जितना कि काजल पोते हम चवन्नी की मुस्कान मारे दिखा करते थे ।😍

पहले तो बच्चा का गंध भी अलग ही होता था । कड़वा तेल, काजल और कपड़े में सूख चुके दूध और बच्चे के चरणामृत का मिश्रित गंध खास तरह का ही होता था ।😍

अब तो बच्चा जॉनसन वाला महक छोड़ता है और काजल का टिक्का तो खोजना ही पड़ेगा कि किधर है । कजरौटा वाला दिन अब ढल गया है और जॉनसन वाला डब्बा मजे में है । लंगोट विकास का चरम रूप लेकर अपने नए अवतार "डायपर" में तब्दील हो चुका है । जींस और टॉप के फैशन में अब भला देशी और आरामदायक लंगोट बनाने के लिए मां की साड़ी का टुकड़ा कहां से मिलेगा । और फिर डायपर मां बाप को पूरा सुविधा भी तो दे डालता है....मस्त सोते सोते मोबाइल देखते हुए लुढ़क जाइए ..... चद्दर - भोटिया और लंगोट बदलने का कोनो झंझट नहीं ...🥳

अब डायपर पहन के बच्चा काजल लगाकर अपना इज्ज़त का फलूदा तो नहीं निकाल सकता न !👻

 मगर बिना काजल पोते बच्चा स्मार्ट कैसे दिख सकता है ये समझ से परे है.... 🤔

खैर! काजल का जलवा हमेशा रहेगा भले ही आदमी कितना भी डायपर बदल ले ...! ये वाला  मुश्की काजल लगाकर ही आएगा और यही दिल लूट ले जायेगा ...!🥰 

(©राजू दत्ता✍🏻)

Tuesday, 18 May 2021

ओवरब्रिज

#ओवरब्रिज

पुराने ओवर ब्रिज से जुड़ी यादों को भला कौन भुला सकता । ऊपर हम और नीचे छुक - छुक चलती रेल को देख लेने का वो बेहतरीन पल हम आजतक नहीं भूल पाए हैं । ठीक ऊपर चढ़कर सायकिल पर बैठ बिना पैडल मारे अपने पैरों को उठाए ठीक बसंत टॉकीज पर हरहरा के पहुंच जाना किसी फॉर्मूला वन के रेस से कोनो कम नहीं था । सायकिल के टायर को ऊपर से नीचे हांकते हुए दौड़ते - दौड़ते हम सीधे बनिया टोला पहुंचकर ही दम साधा करते । लोहे की गोल रिंग को सीक से गोल - गोल चलाते हुए ऊपर से नीचे तूफानी रफ्तार में हम रोज ओलंपिक जीत लेने का सबब रखते थे । बॉल बेयरिंग लगी लकड़ी की गाड़ी को ऊपर ले जाकर उसपर बैठ तूफानी रफ्तार से नीचे आकर अपने हाथ - पैरों से ही ब्रेक लगा हम उन्हीं दिनों फोर व्हीलर का लुफ्त उठा चूके थे । थोड़े बड़े हुए तो रोज शाम को भुट्टा खाने ओवर ब्रिज जा धमकते और चूल्हे की आंच में तपे भुट्टे पर नींबू और नमक का तड़का लिए सबूत हरी मिर्च को हपक - हपक कर खाने का मजा तो हम कटिहार वाले ही ले सकते थे । घंटों ओवर ब्रिज पर यूं ही बेवजह ही वजह ढूंढते फिरा करते हम । कभी चुंबक ढूंढने की कवायद तो कभी नीचे दौड़ती रेल के डब्बे गिनने की होड़ । कभी घंटों रेलवे की वो वाटर टैंक में भरते पानी को देख अपनी दांतों तले उंगिलियों को दबाया करते और बातें किया करते कि पूरी दुनिया में पानी यहीं से जाता है और पानी टंकी अगर टूट गई तो पूरी दुनिया डूब जायेगी । ये सारे अफसाने तो बस ओवर ब्रिज पर ही टिके थे । सूअरों के झुण्डों को नीचे चरते देखना और ऊपर से सरकते हुए उनके पास जाना और फिर भाग खड़ा होना बहुत ही एडवेंचर का काम हुआ करता । यही तो एक चीज हुआ करती थी उन दिनों जहां हम अपने बचपन को अपनी तस्वीर दिया करते और धीरे - धीरे बड़े होते गए । स्टीम इंजन की स्टीम जितने करीब से हमने देख रखा है , शायद ही किसी ने देखा हो । ओवर ब्रिज ने हमारे बचपन और जवानी के सफर के बीच ब्रिज का ही काम नहीं किया बल्कि आज भी उनका वो अद्भुत सौंदर्य हमें अपने उन पुराने दिनों में खींच ले जाता है , जहां हमारी जिंदगी बेवजह ही वजह ढूंढा करती थी।

(राजू दत्ता✍️)

Monday, 5 April 2021

सुकून की चाय

एक छोटा गैस सिलेंडर , दो चार काम चलाऊ बर्तन और एक सॉसपेन । बस किचन के नाम पर यही पर्याप्त था । फर्नीचर के नाम पर एक लकड़ी की टेबल और एक कुर्सी । पलंग या चौकी की जरूरत नहीं थी । जमीन पर बिछे गद्दे पर ही गहरी नींद आ जाया करती । एक रेडियो जिसपर गीतमाला चलती रहती और बीबीसी का समाचार । हमने नए दौर में भी पुराने गानों को विरासत की तरह समेटे रखा था । बस उसी सिमटी सी दुनिया में फैली हुई जिंदगी गुलज़ार हुआ करती । बस कुछ ही रुप्पयों में जिंदगी आलीशान सी गुजरा करती थी । कूकर की सीटी के साथ चिकन कड़ी , अंडे का तड़का और फिर पनीर का देशी स्वाद और फिर उसी कूकर में पका चावल । खाना बनने के दौरान टाटा गोल्ड की कड़क चाय सॉसपैन में उबलती हुई अपनी भीनी - भीनी खुशबू छोड़ती हुई हमें महकाया करती । खाना तैयार होते ही न्यूजपेपर बिछाकर पहले लैपटॉप ऑन कर भूले - बिसरे आईएमडीबी रेटिंग 8 से 10 वाले मूवी का झटपट लगाना और ऊपर से दिनभर की भूखी पेट और पूरी तरह चटे हुए दिमाग को शानदार खुराक के साथ बीता हुआ पल कोई मामूली नहीं था । खाना खत्म हो जाता मगर फिल्म चलती रहती और हम अपनी हाथों के साथ - साथ बर्तन को भी चाट - चाटकर साफ और बिल्कुल साफ कर दिया करते । फिर देर रात और टाटा टी गोल्ड का साथ और फिर कंबल ओढ़ के बातों का दौर और फिर गहरी और बहुत गहरी नींद। बिना ज्यादा खर्चों के करकी की जिंदगी भी कितनी सुकून भरी थी । तनख्वाह काफी कम थी , उतनी कम कि रोज की जिंदगी गुलज़ार हो जाया करती और फिर तनख्वाह बढ़ी और फिर सपने बढे । सपनों की जिंदगी में हकीकत के अफसाने खोते चले गए । बरसों का साथ , दोस्तों का हाथ और वो चाय की सॉसपेन अब भी है मगर वो आलम , वो बिना थके रातों का जागरण नहीं रहा । अब रातें उन यादों को लेकर आती है और हम यूं ही उन जलती चाय की खुशबुओं में खुद को डुबोकर फिर वही शाम जी लिया करते हैं । चीजें कम हो तो जिंदगी में बोझ भी शायद कम होते होते हैं और चीजें बढ़ती जाती हैं और बोझ भी । जिंदगी का असली शुरूर हल्का होना ही है और हल्की सी जिंदगी ही बहुत और बहुत ऊंची उड़ा करती है ।

(राजू दत्ता ✍️)

बर्फवाला

बात उन गर्मियों की है जब हम वो लाल - पीली और हरी - नीली आइस्क्रीम के उतने ही दीवाने हुआ करते जितने कि आज चाय के हुआ करते हैं । हल्की मिठास और थोड़ी सी कड़वाहट लिए पिघलती सी आइस्क्रीम से हमारे दिल पिघला करते और हम आइस्क्रीम वाले की घंटियों और डमरूओ की दिल धड़काने वाली आवाज पर सारे बंधन तोड़ उन तपती दुपहरी में निकल पड़ते । पैसे की परवाह किसे थी , बस निकल ही पड़ते । दूध वाली आइस्क्रीम और ऊपर से नारियल के बुरादे मिलकर हमें एक नायाब स्वाद दिया करते वो भी एक चवन्नी में । आइस्क्रीम में थोड़ा नमक डाल हम उसके भीतर के कीटाणुओं को खुली आंखों से देख लेने का हुनर रखते थे । आइस्क्रीम को चूसते हुए उसके ऊपर सिक्के रखकर उसकी छपाई देखकर हम जो मजे लिया करते वैसा कोई दूसरा मजा आजतक नहीं मिला । कभी - कभार आइस्क्रीम को गमछे के बीच रखकर थकोचकर उसका गोला भी बना लिया करते । आइस्क्रीम खाने के बाद उसकी बची हुई बांस की डनठी को जमा कर हम बांस की दीवारें यानी टट्टी बनाया करते। सबसे खास बात ये थी कि हम आइस्क्रीम के पैसे जुगारने में माहिर हुआ करते । उन दिनों घर में शायद ही कबाड़ हुआ करते जिसे बेच हम आइस्क्रीम ले पाते । हम कौवे के घोंसले ढूंढा करते जिसमें अक्सर लोहे के तार , चम्मच और भी कुछ न कुछ हमारे काम की चीजें मिल ही जाया करती । काम बड़े हुनर और हिम्मत का हुआ करता । कौवे के झुण्डों और उसकी चोंच यानी लोल का सामना करते हुए घोंसले पर हाथ साफ कर लेना आसान नहीं था । काम तो यह ठीक नहीं था मगर यही काम ही था हमारा ।बर्फ खाकर किसकी जीभ कितनी लाल हुई यह देखकर ही विजेता का चुनाव हो जाया करता । बर्फ खाने के बाद पानी का अजीब स्वाद हमें एक नया खेल दे जाता । सुना है अब बर्फ वो रंग नहीं दे पाता । वो रंगीन बर्फ अब आइस्क्रीम पार्लरों में कैद होकर नए रंग में रंग चुकी है जो हमारी जीभ को रंगती नहीं । अब बर्फ सिर्फ खाया जाता है और वो खेल बंद है । वो दूध वाली आइस्क्रीम और नारियल के बुरादे अब नहीं मिलते । अब कौवों के घोंसले भी कहां दिखते हैं । अब तो घरों में कबाड़ भी काफ़ी होते हैं मगर वो डमरू बजाता हुआ बर्फवाला नहीं आता । बर्फवाले की घंटी अब बजती नहीं । बस दूर कहीं एक डमरू की डमडम और घंटी की टनटन बजती सी महसूस हुआ करती है । बात आज की गर्मियों की अब बदल चुकी है ।

(राजू दत्ता✍️)

Sunday, 21 March 2021

पुराना मकान

ठिकाने तमाम हों राहें जिंदगी में
सुकूं जिंदगी को मिलता है पुराने मकान में ।

रातें हुआ नहीं करती शहरों में
अच्छी नींद तो बस आती है गांव के बागान में।

भीड़ तमाम होती शहरों की दुकान में
अपने तो बस मिलते हैं पुराने मकान में ।

लाख ठंडे हो कमरे आलीशान
देते हैं सुकून पुराने ही मकान ।

ठिकाने तमाम हों राहें जिंदगी में
सुकूं जिंदगी को मिलता है पुराने मकान में ।

Friday, 19 March 2021

बुझे हुए पटाखे

बुझे हुए पटाखे 
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काली पूजा ही हमारे यहां दीपावली हुआ करती है । दुर्गा पूजा के ठीक २०वें दिन । दुर्गा पूजा पर मिले नए कपड़ों को दुबारा सहेजकर काली पूजा के लिए रख दिया जाता था । विजयादशमी का दिन हमारे लिए काफी खुशनुमा भी हुआ करता और उदासी लिए भी । खुशनुमा इसलिए कि उसी दिन बड़ों के पैर छूने पर पगड़ी यानी मेले घूमने के पैसे मिला करते और उदासी इसलिए कि मेला अब खत्म । दसों दिन खाली जेब मेला घूमने के बाद दशमी में कुछ नए सिक्कों की खन - खनाहट से हमारे चेहरे पर जो रौनक होती उसी की चकाचौंध से मेले गुलज़ार हुआ करते थे । दशमी के दिन नारियल के लड्डू और गुड़ वाली खोई  का नायाब स्वाद वो भी नए सिक्कों के भारीपन लिए हमारे लिए एक सल्तनत के सरदार होने जैसा हुआ करता । खैर दशमी की जादू भरी रात पलकों में बीत जाती और मेला सिमटने के कगार पर हुआ करता । 

अब हमें रौशनी के पर्व काली पूजा का बेसब्री का इंतजार हुआ करता । सच तो यही है कि हमें पूजा से ज्यादा बारूद की वो गमगमाती गंध लेने का ज्यादा ही इंतजार रहता । पटाखों में पैसे खर्च करने का हौसला उन दिनों बहुत ही कम लोगों को था । फिर भी बारूद की गंध जरूरी थी त्योहार को रंगीन करने के लिए । उन दिनों एक पैकेट नागिन छाप ही हमारे लिए बोनांजा पैकेज हो जाया करता था और हम करीने से एक - एक लड़ियां छुड़ा - छुड़ा कर पटाखे अलग किया करते ताकि पलीती न निकल जाए । एक - एक पटाखा हमारे लिए हीरे से भी कीमती हुआ करता । लंबी सी संठी के मुंह के सिरे पर पटाखा फंसाकर डिबिया की लौ से पटाखा फोड़ लेने का हुनर हमें बखूबी था । छुड़छुड़ी , रस्सी, अनार , लौकी , हाइड्रो बम , रेल , रॉकेट, बुलेट न जाने कितने तरह के साजों समान हुआ करते मगर नागिन की लड़ी ही हमारे खजाने का नूर हुआ करती । सांप तो हम रोजाना बनाया करते । एक काली से टेबलेट को जलाकर पूरा सांप निकाल लेना सपेरों को भी नहीं आता था जितना कि हमें । दुर्गा पूजा के खत्म होते ही हम कैंडल बनाने का काम शुरू कर देते । हम जिस कैंडल की बात कर रहे वो मोमबत्ती वाली नहीं बल्कि बांस की बत्ती के शानदार ढांचे पर रंगीन पन्नी और कागज़ की नक्काशी की कर रहे । बत्तीस काठी , चौसठ काठी , चांद , तारा , दिल , जहाज और भी न जाने कितने ही डिज़ाइन के । शाहिद चौक और बनिया टोला चौक पर ऐसे कैंडल की दुकानें सजा करती और हम भी एक कुशल व्यापारी की तरह कुछ सिक्के कमा लिया करते । ये सिक्के पटाखों पर खर्च के लिए कतई नहीं हुआ करते । हमारे दिमाग में यह बात बैठा दी गई थी कि पटखों को जलाने का मतलब पैसा ही जलाना है और शायद इसलिए हम औरों के बुझे हुए पटाखों से बारूद निकलकर उसका प्रयोग किया करते । अधजले और बुझे हुए पटाखे ढूंढना हमारे लिए अलीबाबा के ख़ज़ाने ढूंढने से कम नहीं था । काफ़ी दुष्कर कार्य हुआ करता था । बड़ों की नजरों में आए बिना सड़कों से पटाखे हल्के पांव में चुपके से दबाते हुए उठा लेना काफी हुनर का काम था । हमें बेइज्जती की फिकर नहीं थी । फिकर थी बस पिटे जाने और शिद्दत से चुने सारे पटाखे छीनकर फेंके जाने की । ख़ैर , हम किसी तरह अपना असला तैयार कर ही लिया करते । काली पूजा की देर रात से लेकर तड़के सुबह उठकर सारे बुझे हुए पटाखे हम चुन ही लिया करते और सात ही में अधजली मोमबत्तियां भी जिसे हम गला - गलाकर अलग - अलग रूप दे दिया करते । बुझे हुए पटाखे का बारीकी से परीक्षण कर हम अलग - अलग कर लेते । जिसमें कुछ भी जान बची होती उसे धूप में सुखाकर फोड़ने का प्रयास करते और बाकियों का बारूद निकलकर या तो बड़ा बम बना लिया करते या बारूद को ही सावधानी से सुलगाकर उसका अद्भुत रूप और गंध को महसूस करते । हम अकेले नहीं होते थे , पूरी की पूरी पलटन साथ हुआ करती । रातभर ओस में भींगे बुझे हुए पटाखे को जिंदा कर लेना हमें बखूबी आता था । अक्सर बारूद हमारी आंखों को अंधेर कर दिया करती मगर उसका एक अलग ही नायब अनुभव था जो बडे़ लोगों को तो कभी मयस्सर भी नहीं हुआ । हम पटाखे भले भी बुझे हुए इस्तेमाल किया करते मगर हम खुद तरोताज हुआ करते थे ।

कहते हैं दिवाली पैसे वालों की होती है मगर सच तो यही है कि दिवाली का दीया तो हमारे दिलों में बिना सिक्कों की खनक के ही बखूबी जला करता जिनकी रौशनी हमारे दिलों से निकलकर पूरे मुहल्ले को जगमगाया करती और शमां गुलज़ार हुआ करती ।
__________________________________________(राजू दत्ता ✍️)

Saturday, 27 February 2021

जगह

जगह
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हम किस चीज को कितनी अहमियत देते हैं यह इस बात से जाहिर हो जाता है कि उसे हमने कौन सा स्थान दिया है । मसलन आज जूते और सैंडल जगमगाते शोरूम में सजे मिलते हैं । बड़े ही सहेजकर रखे जाते हैं । उसकी चमक फीकी न पड़ जाए इसका मुकम्मल हिसाब रखा जाता है । बहुत अच्छी बात है कि हम चीजों को संभाल कर करीने से रखते हुए उसका सम्मान करते हैं । आजकल ब्रांड का सम्मान आदमी से ज्यादा हो चुका है । ब्रांडेड पहनावे से आदमी का कद नाप लिया जाता है । आदमी के अंदर कौन सा ब्रांड है , इसका न तो कोई आकलन करता है और न ही इसकी फुरसत है लोगों को । बस आप ब्रांडेड लबादों से सजे हों और चाल - ढाल ब्रांडेड जैसे हो तो आपका आकलन आसानी से बिना प्रयास के ही हो जाता है । अब चीजें बोला करती हैं और आदमी चुप है । ख़ैर , जिंदगी के मायने और दिलों के अफसाने समय के साथ बदलते हैं और आगे भी बदलते रहेंगे । कभी - कभी बदलाव का चक्र हमें व्यथित करता है मगर इस व्यथा का कोई इलाज़ नहीं होता । हम बात जूतों की ही कर लें । जूतों का सम्मान अब बहुत बढ़ चुका है  । शोरूम से निकलकर जूते अब बेडरूम तक अपनी चमक लिए सजे मिलते हैं । ब्रांड कहीं भी , कभी भी बेरोक टोक आ जा सकता है । पहले जूतों को इतना सम्मान नहीं मिलता था । उसकी जगह आंगन की डेहरी तक ही हुआ करता था । समय के साथ जूतों ने आदमी के दिमाग पर फतह पा ली और आज खुद आजाद है । अब जूते मायने रखा करते हैं । दूसरी तरफ आजकल किताबें सड़कों पर बिछी दिख जाना आम सी बात हो गई है । किताबों ने अपनी पकड़ खो दी है । किताबें ने समय के साथ संघर्ष में हार सी मान ली है । लोगों ने किताबों की जगह बदल डाली है । हां , यह सही है कि आज भी किताबें भी अपनी चमक - धमक लिए शोरूम से लेकर बेडरूम तक जगह बनाए हुए है मगर काफी संघर्ष करते हुए । ऐसे लोगों की संख्या अब कम सी होती जा रही है । कुछ किताबें होनी चाहिए मगर बस दिखाने के लिए । बुकसेल्फ अब सजावट का साज सा बनता जा रहा । सड़कों पर बिछे किताबों और शोरूम में टंगे जूतों को देखकर अजीब से कश्मकश में पड़ जाते हैं मगर सच तो यही है । धार्मिक ग्रंथ से लेकर अमर साहित्य सब के सब सड़कों पर बिछे बिकते मिल जाया करते अब । हमने चीजों की जगह बदल दी हैं अपनी जरूरतों के हिसाब से । ये बदलाव अब नया बदलाब लाने की दिशा में अग्रसर है । अब किताबों में जिल्द लगाने का जमाना चला गया है और मोबाईल स्क्रीन पर स्क्रीन गार्ड लगाने का जमाना है । अब जूतों को चमकाया जाता है और किताबों की फीकी पड़ती चमक को नजरंदाज किया जाता है । अब किताबें पढ़ी कम और पॉडकास्ट पर सुनी ज्यादा जाने लगीं हैं । किताबें अपनी जगह बदल रही है और आदमी भी और ये कहना ज्यादा सही होगा कि आदमी अपनी जगह बदल रहा है और इसलिए चीजें भी जगह बदल रही हैं । जरा सोचिए हम किसे और कौन सी जगह देते हैं और सही चीजों की जगह ही हमें सही दशा और दिशा दे सकती है । समय अब भी शेष है । जगह बदलिए ।
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(राजू दत्ता✍🏻 )

Monday, 28 September 2020

किस्सा आम का


किस्सा आम का
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आम का बड़प्पड़ तो उसके नाम से ही झलक जाता है। इतना खास होकर भी नाम है " आम”। आम की लकड़ी , आम और आम का पल्लव ये तीन तत्व कोई आम तत्व नहीं । इसने हमारे जीवन तत्व को अपना तत्व देकर हमें आज भी जीवंत रखा है । हे आम ! तुम्हे बारम्बार नमन है ! आम ने हमारे बचपन के जादुई दुनिया में एक अहम किरदार निभाया है जिसकी शानदार यादें आज भी हमें स्वप्न लोक की सैर करवा ही दिया करती है। सारे जहाँ की बेशकीमती दौलत एक तरफ और एक बालक के हाथ में एक पका आम एक तरफ ।  कोई तुलना नहीं , कोई उपाय नहीं । इतनी शानदार चीज और बातें गुजरे ज़माने की न हो तो बेमानी होगी ।  कमोबेश हर किसी ने एक ही जिंदगी जी रखी है मगर रंग अलग - अलग से रहे होंगे । बातें हमारे बचपन और आम की भी उतनी ही खास है ।

हम उस ज़माने के पुराने पके हुए चावल हैं जो अपने छुटकपन में ही महज आम के टिकोले की गुठली हाथ में लेकर गुठली से ही पूछ लिया करते कि किसकी शादी किधर होगी और फिर इत्मीनान से पूरे मजे लेकर टिकोले को काले नमक और लाल सुखी मिर्च के बुरादे के साथ चटकारे ले लेकर यूँ ही मस्ती में धीरे - धीरे खा लिया करते । उन दिनों आम के मौसम आते ही काले पाचक कि छोटी सी बोतल में काला नमक और लाल सूखी मिर्च के बुरादे हम ठूंस - ठूंस कर पहले ही भर लिया करते और हमारी हाफ पैंट की जेब में वो बोतल पुरे समय साथ हुआ करता ।  हम आम की गुठलियों के बाजे बनाकर भी मस्ती से उसकी पॉपी बजा - बजाकर यूँ ही रोज जश्न मना लिया करते । हमने आम के आम और गुठलियों के दाम वसूल कर रखे थे। कहावत हमारे बाद ही आयी थी ।
 
हम उस पीढ़ी से हैं जो आम के पाचक खाना पचने के लिए नहीं बल्कि पेट भरने के लिए भरपेट खा लिया करते और फिर उसे पचने के लिए फिर वही पाचक दूसरों से मांग खाया करते थे।  आम - पापड़ को हम चबाने के घंटों बाद भी अपनी दांत में फंसे टुकड़े को समय - समय पर खोदकर उसका क़तरा- क़तरा चूस लिया करते।

आम का अचार , आम की चटनी ,आम का मुरब्बा , आम का गुरम्मा , कच्चा आम , पक्का आम , पिलपिला आम , अलबेला आम , मैंगो मस्ती ,आम - रोटी , चूरा - आम  कुल मिलाकर हमारा बचपन आम के इर्द - गिर्द ही घूमकर आम सा हुआ करता था।  हर कोई आम था , कोई खास न हुआ करता था।

गर्मियों की छुट्टियों का पर्याय आम खाने से ही हुआ करता और नानी के घर आम खाने का प्रयोजन ही पूरे साल का एकमात्र प्रयोजन हुआ करता था । आम ने सबको बड़े ही खास तरीके से जोड़ रखा था और जोड़ काफी मजबूत हुआ करती थी ।
 
आम खा - खाकर हमने अपने शरीर और चेहरे विशेषकर अपने माथे पर बड़े - से - बड़े फोड़े बना डालने का विश्व - कीर्तिमान रच रखा था । पके आम को काटकर खाने में हमें उतना यकीं नहीं था जितना कि उसे  नीचे की तरफ दांत से काटकर छेदकर चूस -चूसकर उसका क़तरा - क़तरा पी जाने में था। बस आँखें बंद कर आम चूसते हुए हम जन्नत कि सैर कर आया करते । गुठलियों को चूस -चूसकर कौन कितना साफ़ कर सकता है इसकी प्रतियोगिता तो आम बात हुआ करती थी । आम के बोटे को चूसकर गले में खुसखुसी होने कि ख़ुशी छिपाये नहीं छिपा करती थी । कच्चे आमों कि ढेर में से थोड़ा पका आम ढूंढ लेने की कवायद दिनभर चला करती । आम कि गर्मी भले ही पेट बिगड़ दिया करती मगर जो शीतलता मन को मिलती उसका कोई जोड़ - तोड़ न था ।  आम कि सड़ी हुई गुठलियों को जलाकर पाचक बना लेने का हुनर हममें जन्मजात हुआ करता था । गुठलियों से उगे पेड़ का नामकरण और उसके मालिकाना हक़ के लिए होने वाले संघर्ष अक्सर हमारे लिए दोपहर को निकलने वाले सारे दरवाजे बंद करवा दिया करता ।  मगर फिर भी किसी -न -किसी चोर रस्ते का इल्म हमें हो ही जाता और हम निकल जाया करते अपनी सल्तनत कि सरजमीं पर ।

पूरा आम अक्सर हमें मयस्सर नहीं हुआ करता तो एक ही आम को तीन भागों में बांटकर सबको दिया जाता ।  गुठली वाला भाग हमें ज्यादा प्रिय हुआ करता तो जोर भी उसी पर हुआ करता । गुठली से विशेष लगाव का कारण यह था कि गुठली कभी न ख़त्म होने वाली एक लम्बी दास्ताँ  हुआ करती थी । आनंद का वो पल जितना भी लम्बा खिंच पाए , हम उससे भी कही ज्याद खींच लिया करते ।

आम फलों का राजा यूँ ही नहीं है ।  यह सबके दिलो - दिमाग पर राज करता है ।  हमारे लिए तो आम का मतलब आम नहीं बल्कि खास हुआ करता । हल्का कचहरी और मिस्टर बाबू के आम के बगीचे से आम चुराते हुए पकडे जाने पर बहुत अच्छी तरह से सेंकाई होने के बावजूद आम का मोह हर उस दर्द और अपमान को भुला देने को बेबस कर दिया करता था । हलके कचहरी के प्रांगण में आज भी आम का वो पेड़ खड़ा हमारी बाट जोहता दिख जाया करता है । आज बहुत ही काम ऐसे बच्चे हैं जो गुठलियां चूसना और आम चूसन पसंद करते हों ।  कपडे और देह  गंदे हो जाने के अनावश्यक भय ने वो आत्मीय सम्बन्ध को लगभग खो सा दिया है ।  हम तो कपडे के साथ - साथ सर से पैर तक आम -मय हो जाया करते थे ।

हमने तो अपने बचपन की अंग्रजी भी " राम आम खाता  है " से शुरू की और पेंटिंग भी हम सालों आम की ही करते आए और आम ही होकर रह गए ।  खास की कोई चाहत भी न थी । हम तो आम से शुरू होकर आम तक ही सिमटे रहे और गुठलियों से ही वफ़ा निभाते रहे और गीत भी आम के ही गुनगुनाते रहे । आम हमारे लिए केवल मात्र एक फल नहीं बल्कि एक ऐसा जादुई करिश्मा हुआ करता जिसके इंद्रजाल में हमारे बचपन  ने न जाने कितने ही ताने - बाने रच डाले थे। आम आज भी वही है मगर अब बचपन भी आम से आगे निकलकर खास हो चूका है जहाँ आम का वो अद्भुत सौंदर्य आधुनिक साजो सामान की चकाचौंध में मानो छिप सा गया है । अब गर्मियों कि छुट्टियां नहीं बस समर वेकेशन हुआ करता है और समर कैंप लगा करते हैं जहाँ मैंगो सेक बिना गुठली के सीधे आपकी पेट में जा पहुँचता है । आम अब पीस - पीस होकर कांटे वाले चम्मच से भोंककर खाया जाता है ताकि हाथ न मैले हो भले ही दिल कितना ही मैला क्यों न हो । आम केवल आम बनकर रह गया है अब । हमारे समय में आम , आम नहीं , खास हुआ करता जिसकी खासियत की शीतल  छांव में असीम आनंद के पल हम बिताया करते ।
__________________________________________[राजू दत्ता✍🏻]

Sunday, 27 September 2020

कटिहार टॉकीज

कटिहार टॉकीज

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साढ़े तीस लाख से ऊपर लोगों को अपने में समेटे जिला कटिहार एक हंसता - खेलता और हमेशा गमगमाने वाला जिला रहा है । आपदा हो तो त्रासदी , इस जिले को कोई फर्क नहीं पड़ता । सबकुछ झेल लेने का सामर्थ्य लिए यह शहर सदा ही मुस्कुराया है । ऐसे मुस्कुराने की तो हजार वजहें हो सकती हैं , लेकिन यहां चार वजह साफ - साफ खड़ी दिख जाया करती थी । आप सोच रहे होंगे कि भला वो चार वजह क्या हो सकती है और भला उनमें ऐसा कौन सा हुनर है जो पूरे तीस लाख को मुस्कुराने का सबब दे जाता है ! जी हां , इन चार वजहों ने कई दशकों से पूरे जिले को महज मुस्कुराहट ही नहीं , तालियों की गरगराहट , सीटियों की सनसनाहट और ठुमकों की ठुमकाहट से भी बखूबी नवाजे रखा है । औरों के लिए ये चार वजह महज ईंट - गारे का बना ढांचा मात्र होगा , हमारे लिए तो ये जिंदा आदमी से ज्यादा जिंदा हुआ करते थे । ये चारों ठीक बिन ब्याहे उस चाचा की तरह थे जिसने हमें अपनी पीठ पर चढ़ा - चढ़ाकर किस्सागोई भी करवाई और साथ में चिनिया बादाम का देशी ठोंगा भी हमारे हाथों में थमाया था । जी हां , ये चारों बिन ब्याह चाचा की ही तरह तो थे जिसका भरपूर इस्तेमाल हम सबने बराबर किया है और बदले में उसे मिला भी तो जर्जर शरीर और वक़्त के थपेड़े ।

उन दिनों फिल्में देखना बहुत बड़ी बात हुआ करती थी । अवयस्क लड़कों का फिल्म देखना उसकी बर्बादी के सारे रास्तों का खुल जाना माना जाता था । फिलमचियों को तो अव्वल दर्जे का आवारा और हाथ से निकला लड़का समझा जाता था । जी हां , ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों की ही बात हो रही है । रंगीन फिल्मों की बात तो बिल्कुल ही बेमानी होगी । जिसे रंगीन फिल्म देखते पकड़ा जाता उसे बेरंग मानकर कुल के नाशक की उपाधि दे दी जाती और वह नक्सली हो जाने को बाध्य हो जाता । मॉर्निंग शो केवल बुड्ढों के लिए ही आरक्षित जान पड़ता था । जवान और वयस्क लोग दूसरे जिले में जाकर ही इसका लुफ्त उठा पाते और यह मौका केवल किसी की बारात में ही जाने पर मिला करता । उन दिनों जिला पार करना उठना ही दुर्गम था जितना आज बिना वीजा के अमेरिका जाना । इतनी जद्दोजहद के बाद भी क्या लुफ्त मिलता था यह तो गुप्त ही रहे तो उचित होगा या फिर गूंगे का गुड़ ही रहे तो ठीक है ।

इस शानदार जिले ने हमें कुल चार ही तो सिनेमा हॉल का नायाब तोहफा दे रखा था जिसे हम मुस्कुराने की चार वजह कह रहे हैं । इसे चार हॉल नहीं बल्कि इसे शहर के उत्सव की चार स्तंभ कहें तो ज्यादा उचित होगा । हां, फिल्म देखना किसी उत्सव से काम तो नहीं हुआ करता था उन दिनों । रोमांच और कौतूहल भरा उत्सव! ये चार सिनेमा हॉल हमारे लिए चारों धाम ही हुआ करता था जिसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की अनुभूति हो जाया करती थी ।

अगर बात रैंकिंग की की जाए तो पहला स्थान " बसंत टॉकीज " का हमेशा रहा है । इसकी लोकेशन और फिल्मों का चयन इसकी रैंकिंग को बनाए रखने में काफी हद तक जिम्मेदार था । थाने के पास की लोकेशन इसकी सुरक्षित होने का अहसास दिला ही दिया करती थी । ये बात अलग है कि टिकटों की ब्लैकिंग भले ही खुलेआम थी फिर भी थाने का होना ही सुरक्षा की गारंटी थी । शायद यही कारण था कि सबसे साभ्रांत सिनेमा हाल का दर्जा इसने बिना किसी प्रयास के ले रखा था । शहीद चौक पर गर्व से खड़े इस सिनेमा हॉल ने इस शहर को जितनी खुशी और हर्षोल्लास दी है , शायद ही किसी और चीज ने दी होगी । यह सिनेमा हॉल अकेले नहीं खड़ा था । इसने न जाने कितने ऐसे दुकानों को अपनी छाव में पोषित किया था जिसकी वजह से न जाने कितने ही घरों की रोटियां सेंकी जाती थीं । झालमुढ़ी वाला , चिनिया बादाम वाला , घुप चुप वाला , समोसे वाला , चाट वाला , पान - बीड़ी - सिगरेट वाला और भी न जाने क्या - क्या वाले इसकी ही छाव में अपनी जिंदगी गुजर - बसर किया करते थे ।

उन दिनों सिनेमा ही एकमात्र मनोरंजन का साधन हुआ करता था । शायद ही ऐसा कोई नवविवाहित जोड़ा रहा होगा जिसने बसंत टॉकिज की बालकनी वाली सीट पर अपने उन यादगार लम्हों को नहीं जीया होगा और फिल्म के बाद बसंत टॉकीज की ही गली में सागर रेस्त्रां में शानदार चाट - पकौड़े के जायके का लुफ्त ना उठाया हो । ससुरालियों को सुख देने का बस एक ही उपाय उन दिनों था कि उन्हें बसंत टॉकीज में फिल्म दिखाकर चाट खिला दी जाए और हाफ टाइम में चिनिया बादाम काले नमक के साथ और कोका - कोला और फैंटा पिला दी जाए । इससे ज्यादा वीआईपी इज्ज़त उन दिनों नहीं दी जा सकती थी । कोका कोला और फैंटा वाला न जाने किस हुनर से हाफ टाइम में किर्र - किर्र बोतलें बजाकर घूमता रहता और फिल्म खत्म होने पर करिश्माई तरीके से बोतल वापस ले जाता यह आज भी विस्मित कर देता है और वही आवाज कानों में गूंजती सी रहती है । अब न वो हुनर है और ना ही हम जैसे हुनर के दीवाने ।खास तरह के लिट्टी और चाट की दुकानों में मौजूद जायका और बसंत टॉकीज में बैठकर फिल्मों का लुफ्त किसी भी स्वर्गिक आनंद से कम न था और यह शानदार स्वर्ग - सुख हम सबने यहीं जिंदा ले रखा था ।

अब भी अपनी सांसों में उस हॉल की खुशबू और कानों में वही धमक बरकरार है । आज भी सीटियों की सनसनाहट जेहन में एक तरंग छोड़ जाती है । पूरे जिले में ऐसा भला कौन होगा जिसकी यादें बसंत टॉकीज से ना जुड़ी हों!  बसंत टॉकीज ने हम कटिहार वासियों को जो प्यार , जो खुशी और जो जश्न - ए - माहौल दिया है उसका ऋण चुकाए नहीं चुक सकता । उन अंधेरे दिनों में जो रोशनी इस हॉल ने हमें दिया है उसके सामने आज के आलीशान मल्टिप्लेक्स भी फिके पड़ जाते हैं । बसंत टॉकीज महज एक हॉल नहीं रहा है बल्कि एक विशाल व्यक्तित्व रहा है जिसकी छाव में पूरे शहर ने अनगिनत सुकून और आनंद के पल बिताए हैं । जिसने पूरे शहर को इतनी खुशियां बांटी , आज खुद वीरान पड़ा है । कारण चाहे जो भी हो , एक शानदार विरासत जिनकी छाव में पूरा शहर जिंदा हुआ करता था , आज खामोशी से अपने अंत के इंतजार में निशब्द खड़ा है । काश!  इस ऐतिहासिक विरासत को हम सहेजकर रख पाने का सामर्थ्य रख पाते!

बात अब दूसरे रैंकिंग की की जाय तो उसमे आता है - " श्यामा टॉकीज " । इसी हॉल के नाम पर आज भी वो पुरानी सड़क उन पुराने दिनों की याद दिलाया करती है । बसंत टॉकीज और श्यामा टॉकीज के बीच काफी कम दूरी है और अक्सर नई फिल्में यहीं उतरा करती । अपनी शान - ओ - शौकत में यह किसी भी तरह बसंत टॉकीज से कम नहीं था । इसके बडे पर्दे पर डिजिटल डॉल्बी के शानदार साउंड की धमक और ढिसुम - ढिसुम का मजा पूरे शहर ने बराबर लिया है । हॉल के ठीक सामने मिठाइयों और समोसे की दुकानें देर रात तक सजी होती मगर चिनिया बादाम की जगह कोई नहीं ले पाया । तिसी तेल में छने पापड़ का स्वाद भी उन दिनों फिल्मों पर अपना जायका जमाए हुए था । पापड़ खाते हुए फिल्म देखने के लिए काफी पापड़ बेलने होते थे । इसी टॉकीज से बिल्कुल ठीक सटे चाय की दुकान का लिकर वाली चाय का बेमिसाल जायका हमें और कहीं मयस्सर नहीं हुआ । इसकी गली में आगे जाकर जलेबियों और समोसे की दुकान का वो जायका आज भी मुंह में पानी ला देने का सामर्थ्य रखता है और हम अचानक से फिर से उन्हीं दिनों में बरबस ही चले जाने को बाध्य हो जाया करते हैं । क्या अद्भुत सामंजस्य हुआ करता था । कितनी चीजें जुड़ी हुआ करती थी एक ही चीज से । एक शानदार ताना - बाना रचा - बसा हुआ करता था उन दिनों । सिनेमा हॉल महज एक हॉल नहीं बल्कि अपने आप में एक भरा - पूरा परिवार हुआ करता जहां खुशियां यूं ही बंटा करती । पूरे शहर को जोड़कर रखने वाले इस हॉल को न जाने किसकी नजर लगी कि अपनों की ही बेवफ़ाई ने इस हॉल को जिंदा ही मुर्दा कर दिया । यहां तक कि इसकी तस्वीर भी गूगल करने पर भी कहीं नजर नहीं आती आज के इस डिजिटल जमाने में । पूरे कटिहार को अमूल्य सेवा देकर भी उपेक्षित होकर आज यह निशब्द अपने भाग्य पर आंसू बहा रहा है । सामने गुजरते हुए अपनी आंखें इस विशाल व्यक्तित्व से न मिला पाने का दर्द लिए चुप - चाप गुजर जाने के सिवा और कोई विकल्प नहीं रह जाता ।

अब बात तीसरे रैंकिंग वाली प्रकाश टॉकीज की की जाए तो न्यू मार्केट के ठीक बीचों बीच गर्व से खड़े इस शानदार हॉल के पास सबसे ज्यादा लोगों को एक साथ अपनी गोद में लिए सम्पूर्ण सुख देने का सामर्थ्य था । नई फिल्म क्या लगती , पूरे का पूरा हॉल दुल्हन की तरह सज उठता । लंबे - चौड़े कैंपस में एक मेला सा लग जाया करता था । इस हॉल की अपनी एक भव्यता थी । मॉर्निंग शो के लिए यह हॉल ज्यादातर लोगों की यह पसंदीदा हॉल हुआ करती थी । कारण अनेक हैं । प्रकाश टॉकीज ने न्यू मार्केट को एक नई पहचान दी रखी थी । हॉल के बाहर एक घिरनी वाला घिरनी घुमाकर पैसे लगवाता और इसी पैसे जितने वाले खेल से पैसे जीतकर हमने काफी फिल्में देख डालीं थी । डीलक्स होटल की दाल - कचौड़ी और छेना - जलेबी खाकर फिल्म देखने का सौभाग्य हमने बारम्बार पा रखा था । आज वही प्रकाश टॉकीज अपनों की अपेक्षाओं का दंश झेल रहा है और जब कभी सामने से गुजरना होता है , नम आंखों से अपने इतिहास को बार - बार दुहरा रहा होता महसूस होता है । कुछ परिवर्तन निश्चित ही कष्ट देते रहते हैं । नियति शायद इसी को कहते हैं । कोई जोर नहीं चल पाता ।

अब आते हैं चौथी रैंकिंग वाले हॉल - हरदयाल टॉकीज पर । यह तो पता नहीं कि यह बना कब था मगर हुलिए से यह सबसे बुजुर्ग सिनेमा हॉल जान पड़ता था और फिल्में भी यहां पुरानी ही लगा करतीं । भक्ति फिल्मों और भूतों वाली फिल्मों पर इसका लगभग आधिपत्य ही था । यह एक ऐसा सिनेमा हॉल था जिसने खास रूप से गावों की भीड़ को अपनी ओर खींच रखा था । सालोंभर शामियाने सजे रहने का कीर्तिमान भी इसी के पास था और लोग दूर गाव से अपनी पोटलियों में चूड़ा - मूढ़ी और जलेबी लिए इसी हॉल में अपनी जिंदगी के खुशनुमा पल बिताने आया करते थे ।

बांग्ला और भोजपुरी फिल्मों पर एकमात्र इसी का आधिपत्य था । इस हॉल की कैंपस के भीतर ही एक छोटा सा होटल हुआ करता था जिसके छेने - पाईस का स्वाद पूरे शहर ने ले रखा था और वो जायका भूले ना भुला जाता । इस सिनेमा हॉल ने सबसे ज्यादा लोगों को अपनी सेवाएं दे रखी थी मगर बदले में इसने कुछ भी नहीं लिया । आज यह हॉल सालों से बंद पड़ा है और अपनी पुरानी विरासत लिए जर्जर होकर भी टिका पड़ा है । अनंत पदों की छाप अपने में समेटे यह हॉल हमारे लिए काफ़ी कुछ मायने रखता है जिसके लिए शब्द नहीं ।

कुल मिलाकर इन चारों हॉलों ने पूरे जिले को अपनी अनमोल एवं निष्काम सेवाएं दे रखीं थीं । उन दिनों भले ही टिकटें ब्लैक में बिका करती , मगर इंसान साफ - सफेद ही हुआ करते थे । फिल्म देखना एक उत्सव सा था । मंगलवार का दिन बाज़ार बंद होने से चारों के चारों हॉल ठसाठस भरे हुआ करते थे । रविवार का दिन हमारा हुआ करता । शुक्रवार को फिल्में बदला करतीं । आज की तरह हर शुक्रवार फिल्में नहीं बदला करती थीं । एक फिल्म महीनों और कभी कभी एक साल भी चला करतीं । बहुत जोड़ - तोड़ कर , गुणा - भाग कर प्लानिंग कर फिल्म देखने का सौभाग्य मिला करता । हम जैसों का छिपकर फ़िल्में देखना काफी दुष्कर हुआ करता क्युकी कोई - न - कोई जानकार सिनेमा देखने आता ही रहता और किसी तरह उनकी नजर से बचकर अंदर चले भी जाते तो सिस्पेंटर तो मुहल्ले का ही हुआ करता जो सीधा हॉल के अंधेरे में भी सीधे हमारे मुंह पर टॉर्च मारने से कभी नहीं चूकने का जन्मजात हुनर रखा करता था और पहचानकर या तो वहीं से भगा देता या रात को घर लौटते समय हमारे घरवाले को चेता दिया करता था । फिर भी मार और यातना पर फिल्में देखने का नशा हमेशा ही भारी पड़ता था और हम फिर से प्लानिंग शुरू कर देते । उन दिनों फिल्म देखने से कहीं ज्यादा रोमांच जुगाड़ और हॉल में प्रवेश का था ।

ठीक फलाना टाइम में फलाना हॉल में फलाना फिलिम में फैलाना सीन और फलाना गाना आएगा , यह हम बखूबी नोट कर लेते और रोजाना गेटकीपर से बकझक कर ठीक समय पर सीन देख आया करते थे । दोस्तों की झुंड में ही एक - न - एक ब्लैकिया हुआ करता जिसकी जिम्मेदारी टिकट लेने और कुछ टिकट ब्लैक में बेच समोसे - लिट्टी का जुगाड करने को होती थी । वही हमारा तारणहार हुआ करता और हम उनकी तारीफों में कशीदे पढ़ा करते । फर्स्ट दिन , फर्स्ट शो देख लेने का रोमांच एवरेस्ट फतह कर लेने के रोमांच से भी कहीं ज्यादा था । भीड़ की बीच में कूदकर लाइन में आगे निकलकर टिकट खिड़की पर करिश्माई ढंग से पहुंचकर छोटी सी छेद में हाथ घुसाकर टिकट ले लेने का हुनर सबको नहीं था । कईयों ने तो अपनी सायकिल बेचकर फिल्म देखने का विश्व कीर्तिमान रच डाला था । हमनें तो एक ही दिन में चारों शो देख लेने का गौरवपूर्ण जीवन भी जी रखा है । कई तो जिला पार पूर्णिया जाकर फोर स्टार में फिल्म देखने की हिमाकत कर बैठते । फ़िल्म देखने की कीमत हम अक्सर अपनी पीठ फोड़वा के भी चुका देने का शानदार अनुभव रखते हैं । स्कूल से भागकर फिल्म देख लेने और न पकड़े जाने  का जो विजय भाव हमारे मुखमंडल पर हुआ करता वह तो ओलंपिक में गोल्ड लाने से भी कहीं ज्यादा हुआ करता था । फ़िल्म देखकर उनके किस्से हू - बहू दोस्तों को सुना डालने का टैलेंट हम सभी को बखूबी हुआ करता था और सुनने वाला अपनी लार टपकाए आश्चर्य से सुनता हुआ हमारे अहो- भाग्य पर जलता - भूनता रहता । फिल्म देख लेना गूलर के फूल को देख लेने से ज्यादा दुष्कर काम था । कई शरीफ़ बच्चे तो जवान होकर ही अपनी चॉइस की फिल्में हॉल में अकेले जाकर देख पाते । हम जैसे बे - शरीफ लोग बचपन से ही नक्सली हो चुके थे और अनंत बार जवां होने से पहले ही लाल - सलाम कर चुके थे । तथाकथित शरीफ बच्चों ने जवान होकर हम जैसे बे - शरीफों को भी पीछे छोड़ लाल - सलाम करने का ठीक उसी तरह रिकार्ड बनाया जैसे अधेड़ उम्र में शादी करने वाला अपनी प्रियतमा के पहलू में ताउम्र सारी दुनिया से छिपकर अपनी वफा का रिकार्ड बना डालता है ।

कुल मिलाकर फिल्में देखने का रोमांच जो उन दिनों था जब जब में फूटी कौड़ी भी नहीं हुआ करती , आज भरे बटुए में भी वो रोमांच नहीं । अब टिकट खिड़कियों पर ठेलमठेल भीड़ नहीं होती , हॉल में शोरगुल और सीटियां नहीं बजा करती । चिनिया बादाम को कब का बेवजह अलविदा कह दिया गया और जो अब पीनट बनकर शराब के संग जीने को बेबस है । मकई के लावे को अब विलायती नाम देकर " पॉपकॉर्न " कहा जाने लगा है । सिनेमा हॉल अब मल्टिप्लेक्स हो चुका है जहां से वो पहले वाले हॉल की महक नहीं आती । पहले उचक - उचककर फिल्में देखने का रोमांच था और अब सरकती हुई सी चेयर एसी की ठंडी हवा में सुलाते हुए फिल्में दिखाने का दावा करती है । पहले हलाहल शोर हुआ करता था और अब न जाने कानों में अलग - अलग झंकार सुनाने वाले डिजिटल साउंड का बोलबाला है । सबकुछ पहले से ज्यादा शानदार होने का दावा है मगर वो कौतूहल , वो रोमांच अब कहीं दूर छूट सा गया जान पड़ता है । बदलते वक़्त ने सबकुछ बदल सा डाला है मगर हम आज भी वहीं , उसी दौर में खड़े हैं जहां दीवारें भी जिंदा हुआ करतीं थीं और हमारे रिश्ते दरो - दीवारों से भी हुआ करते थे ।

राजू दत्ता ✍🏻

Tuesday, 25 August 2020

स्टेशन पहुँचने से पहले ट्रेन खुल चुकी थी

*स्टेशन पहुँचने से पहले ट्रेन खुल चुकी थी*

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*बचपन में हमसे पढ़े - लिखे बड़े लोग अक्सर  इंग्लिश ट्रांसलेशन पूछ लिया जाया करते  थे और एक तो मानो जैसे हमारी नियति में ही लिखी थी - "मेरे स्टेशन पहुँचने से पहले ट्रेन खुल चुकी थी " बड़ी दुविधा थी उन दिनों । अब सचमुच ट्रेन जा चुकी है । अब ट्रांसलेशन पूछने वालों में से अधिकांश समय से पहले ही स्टेशन पहुंचकर ट्रेन पकड़कर अनंत यात्रा को जा चुके हैं । कुछ लोग तो स्पेलिंग पूछने को ही अपना कर्तव्य जान सबसे कोई न कोई स्पेलिंग पूछ लिया करते थे । स्पेलिंग पूछे जाने और न बता पाने की लाज अब खो चुकी है । एक छोटी सी भार्गव की डिक्शनरी घर - घर अपनी मौजूदगी से यह बता दिया करती कि यहां भी लोग अंगरेजी के कदरदान हैं और अब वो डिक्शनरी भी ट्रेन पकड़ समय से पहले जाने कहां जाकर खो गई है । डिक्शनरी तक को याद करके अंगरेजी को धूल चटा देने का सामर्थ्य हम बिहारियों को खूब अच्छी तरह आता था । अब सबकुछ गुगलमय हो चुका है , अबकुछ ऑटो - करेक्ट हो जाता है । अब कोई पूछने वाला नहीं और बताने वाला भी नहीं । अंगरेजी बोलने का हुनर रेपिडेक्स इंग्लिश वाली किताब सिखा दिया करती थी और बस किताब भर होने से आदमी जान जाता कि यह आदमी अंगरेजी बोल लेता है । रेपिडेक्स इंग्लिश की किताब ने न जाने कितने ही घरों को शोभा बढ़ाकर हमारे आन - बान और शान को अपने मोटे कवर से ढककर बिना अंगरेजी बुलवाए ही बचाए रखा था  यह तो बच्चा - बच्चा जानता है । रेपिडेक्स न होता तो आज अंगरेजी जिंदा न होता । हिंदी में अंगरेजी सीखने का शानदार अनुभव लेने का सौभाग्य अब नई पीढ़ी को कहां ? हमने अंगरेजी को हिंदी में सीख लेने का अजूबा काम कर दिखाया था । हम बिहारियों ने बिहारी- हिंदी में अंग्रेजी लिख - बोलकर अंगरेजी की एक नई शैली को खड़ा कर दिया था । आज भी हम अंगरेजी बिहारी में ही बोलने का बखूबी हुनर रखते हैं । बिहारी अंगरेजी ने एक नए फनेटिक को जन्म देकर अंगरेजी से पूरा बदला चुका लिया है और अंगरेजी अब बस खामोशी से सबकुछ सह लेने को मजबूर है ।*

*उन दिनों हम कर्सिव राइटिंग का नाम तक न सुने थे । बस एक चीज हम अपने आप अपनी शानदार प्रतिभा से सीख लिए थे और वह था जैसे भी हो सटा - सटा कर किसी तरह घुमा - फिराकर लप्तुआ अंगरेजी लेखन शैली जिसकी छाप आज भी कई विभागों छपती रहती है । यह हुनर उन दिनों सबको था । सबने अपने - अपने हुनर से एक नई शैली रच दी थी । और हां , तीन लाइन वाली अंग्रेजी की कॉपी हमारे लिए बेकार सी थी और हम हिंदी की दो लाइन वाली कॉपी में ही अंग्रेजी लिख - लिखकर अंगरेजी को बार - बार यह अहसास दिला देते थे कि हिंदी से बचकर कहां भागोगे । अंगरेजी का हिंदीकरण हमने कर ही डाला था । हम बिहारियों को जो सदमा अंगरेजी ने दे रखा था उसका खूब बदला हमने ले रखा है उसका रंग - रूप अपनी मर्जी से बदलकर  और बिहारी टोन से उसका विलायती फोनेटिक बदलकर ।*

*क्लास 6 से अंगरेजी पर फोकस किया जाता था और वो भी " I am , She is ......" टाइप का सिलेबस हुआ करता । 6 से पहले सब लोग वही लप्तुआ अंगरेजी लिखने का ही हुनर विकसित करते रहते और भार्गव की डिक्शनरी को चाट - चाटकर पहले कौन  पूरा पचा लेगा यही कॉम्पटीशन होता रहता। कुछ तो पूरा डिक्शनरी ही घोर के पी जाने का शानदार हुनर रखते थे । उन दिनों स्पेलिंग पूछने की घातक बीमारी चारों ओर फैली होती और यह सबको शिकार बना चित कर दिया करती थी । शायद ही इसके प्रकोप से कोई बच पाया । इसका कोई वैक्सीन नहीं बन पाया और पता नहीं यह बीमारी कैसे बिना वैक्सीन के चली गई । अब स्पेलिंग कोई नहीं पूछता । स्पेलिंग तो छोड़िए अब तो कोई टाइम भी नहीं पूछता । अब दौर किताब - कलम  और घड़ी की नहीं बस एंड्रॉयड फोन की है जहां सब मिलता है बस कोई पूछने वाला नहीं मिलता । अब आदमी काम टॉकिंग टॉम ज्यादा बोलता है ।*

*अब अंगरेजी मीडियम का नया दौर है जहां बच्चा जन्म लेते ही एप्पल खाता है और खेलने के लिए प्ले स्कूल जाता है । हम जैसे सरकारी स्कूल के पैरेंट्स अब नए सिरे से अपने बच्चों के साथ - साथ अंगरेजी स्कूल का अंगरेजी चैप्टर पढ़कर अपनी पुरानी भूल सुधारने में लगे हैं । अब स्पेलिंग नहीं फोनेटिक बताया जाता है । पैरेंट्स मीटिंग में गार्जियन लोग का रैगिंग होता है और बच्चा घर आकर हमको ही पढ़ा देने का जिगर रखता है । अब नया दौर है जिसमें खड़े - खड़े दौड़ लगानी होती है और पहुंचते कहीं नहीं मगर पसीने छूट पड़ते हैं ।*

*तख्ती और स्लेट पर चौक - पेंसिल से लिखना अब बेतुकी का सबब बन चुका है। अब सीधे कॉपियों पर पेंसिल से लिखे जाने का नया दौर है । तख्तियों पर चौक और पेंसिल से अक्षरों की प्रैक्टिस कर सुलेख लिखने पर अब यह कहकर पाबंदी है कि लेख बिगड़ जाएगा । लिखना लिखने की परंपरा अब खत्म हो चुकी है । सुंदर लिखावट की जगह अब कई किस्मों के फ़ॉन्ट ने ले लिया है ।अब तो जिंदगी का फ़ॉन्ट भी स्मार्टफोन और लैपटॉप्स तय कर रहा है । पुरानी दुनिया अब आउटडेटेड होकर नए वर्जन में एक छोटी सी डब्बी ने सिमटकर रह गई है । दुनिया अब वर्चुअल हो रही है जहां सबकुछ हवा में तैर रहा । हम जमीं छोड़ चुके हैं और बस उड़े ही जा रहे ।*

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*© राजू दत्ता✍🏻*